We are Requesting Donations To Serve Humanity, Your 1 Penny Is Heplful To Us 

गेंहू के ज्वारे(Wheat Grass) - सेवन विधि एवं औषधीय उपयोग

गेंहू के ज्वारे - सेवन विधि एवं औषधीय उपयोग

अंकुरित गेंहू को ही उत्तरी भारत के हिंदी भाषा क्षेत्रो में  ज्वारे कहते है ।इसका वानस्पतिक नाम 'ट्रिटिकम वेस्टिकम 'है प्रकृती ने मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिये  सुलभ और सस्ते साधन के रूप में यह वनस्पति उपहार रूप में  दि है 

गेंहू के ज्वारे(Wheat Grass) - सेवन विधि एवं औषधीय उपयोग
संकलन: वैद्य मिलिंद कुमावत 
एम्.डी.(आयुर्वेद)

गेंहू के ज्वारे - सेवन विधि एवं औषधीय उपयोग

अंकुरित गेंहू को ही उत्तरी भारत के हिंदी भाषा क्षेत्रो में  ज्वारे कहते है ।इसका वानस्पतिक नाम 'ट्रिटिकम वेस्टिकम 'है प्रकृती ने मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिये  सुलभ और सस्ते साधन के रूप में यह वनस्पति उपहार रूप में  दि है इसमें उपलब्ध पौषकीय एवं औषधीय तत्त्वो के कारण यह एक बहुमूल्य वनस्पती है ।  
 आजकल गेंहू के ज्वारो के रस को एक स्वास्थ्यवर्धक औषध के
रूप में  घर - घर में  प्रयोग किया जा रहा है ।लेकिन इसके औषधीय उपयोग पर अनुसंधान करके चिकित्सा जगत में  आहार द्रव्यो से रोगियो कि चिकित्सा का एक और मील का पत्थर स्थापित किया डॉ . एन . विग्मोर ने ।अमेरिका कीं रेहने वाली इस चिकित्सक को आंतो का कैन्सर हो गया था ।तब उसने गेंहू के ज्वारो के रस का सेवन करके रोग से मुक्ती पा ली उन्होंने इस आहारीय द्रव्य के औषधीय उपयोग संबंधीत ज्ञान को प्रकाशित करवाया उन्होने ज्वारे के रस को 'ग्रीन ब्लड ' अर्थात ' हरित रक्त ' संज्ञा दि है उनके द्वारा बोस्टन में  स्थापित किया गया 'विग्मोर इन्स्टिट्यूट  '  है चिकित्सा कि संबंधित उन्होने ३५ पुस्तकें भी लिखी डॉ . विग्मोर ने अनेक वनस्पतियो ( जडी - बुटीयों ) के रस को औषधी के रूप में  प्रयोग कर उनके औषधीय गुण -कर्मो को स्थापित किया

किन रोगो में  लाभकारी :

गेंहू के ज्वारो का रस मुख्यतः कब्ज , त्वचा रोग , मोटापा (ओबेसिटी ) , अस्थि - संधि शोथ (arthritis ) , मधुमेह ( डायबेटीस ) कैन्सर आदि रोगो में अति लाभकारी है

कैसे उगाये ज्वारे :

डेढ फुट लंबी , एक चौडी और दो  से तीन इंच गहरी गार्डनिंग ट्रे लें ट्रे की तली में बने छिद्रो को टूटे हुए मिट्टी और जैविक खाद के मिश्रण (:) की इंच मोटी परत बिछा दे ।इस प्रकार सात ट्रे तैयार कर ले
१०० ग्राम जैविक गेंहू के बीज एक बर्टनं पानी में  भिगो दे अगले दिन प्रातः काल गेंहू के बीज पानी में  से निकाल कर मिट्टी से भरकर तैयार कि गई ट्रे पर एक परत के रूप में बिछा दे अब इस पर मिट्टी की आधी इंच परत बिछा दे इसे पानी से सींच दे ट्रे को छाया में  तुरंत खुली हवा में  रखे सूर्य की किरणे सिधी  इस पर नहीं पडनी चाहिए ।जिस दिन (वार ) को गेंहू  बोये है उस  दिन का नाम ट्रे पर लिख दे ,जैसे सोमवार , मंगलवार आदि अगले पुनः एक नई ट्रे तैयार करके उसमें इसी तरह जैविक गेंहू के बीज बो कर उस पर अगले वार का नाम लिख दे जैसे मंगलवार
इस प्रकार सात दिन लगातार एक नई ट्रे में गेंहू बोये और प्रत्येक ट्रे पर क्रमानुसार वार लिखते जाए
प्रत्येक ट्रे में दो बार और सर्दीयो में एक बार स्प्रे बोटल से पानी देकर मिट्टी को गीली रखे
आठवें दिन प्रथम ट्रे ( सोमवार वाली ) में  बोये गये गेंहू से से इंच लंबे ज्वारे निकल चुके होंगे इन्हे जड सहित उखाड कर स्वच्छ पानी से अच्छी तरह धोकर मिट्टी  को दूर करे खाली हुई ट्रे में दुबारा से गेंहू बो दे
ज्वारो की जडे ज्यादा उपयोगी नहीं होती ,इनको कैंची या चाकू से काटकर अलग कर दे उपर के हिस्से को पानी से साफ करके मिक्सी मी थोडा पानी डाल कर बारीक पीस ले अब इसमे आधा गिलास पानी मिलाकर छलनी से छान ले इस प्रातः काल खाली पेट पीये ।छलनी  में बचे हुए रेशो को त्वचा में निखार लाने के लिये चेहरे  और दुसरे अंगो पर मले

मात्रा :

से १२ तोला अर्थात ८० से १२० मि .लि . मात्रा में ज्वारे का रस प्रतिदिन प्रातः काल खाली पेट पीये इस मात्रा को से मात्रा में  बाँटकर दिन में - बार ले  सकते है

ध्यान देने योग्य बाते :

ज्वारे के रस में  चिनी या नमक मिलाकर पीये 
इसमें अन्य मसाले भी मिलाये
इसमें निंबू का रस , संतरे , मौसमी अन्य खट्टे पदार्थो का रस निकालकर सेवन करे खटाई के कारण आम्लता बढने से इस रस  में  विद्यमान उपयोगी एन्जाईम्स निष्क्रिय हो जाती है
ज्वारे का रस पीने में स्वादिष्ट नहीं  होता अंतः इसमे मीठे फलो का रस , गाजर आदि सब्जीयो का रस भी मिलाकर  पी सकते है
यदी इसे पीने पर मिचली या उल्टी आती हो तो कम मात्रा में  इसे पिना शुरु करके धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढाये
इसे पीने के तुरंत बाद ( घंटे तक ) कुछ भी खाये

ज्वारे के रस पीने से लाभ :

ज्वारे के रस में  बहुत मात्रा में  ' प्रति - ऑक्सिकारक ' (एन्टीऑक्सिडेंट्स ) होते है जो कि हमारे शरीर कि 'मुक्त कणो ' (फ्री रेडिकल्ज ) से रक्षा करते है मुक्त कणो की अधिकता से त्वचा में झूर्रिया बनने लगती है ,आयुवृद्धी के लक्षण अकाल (before time ) उत्पन्न होने लगते है ,कैन्सर  , अस्थि संधि -शोथ ,मधुमेह ,उच्च रक्तचाप ,पार्किन्सन्स रोग आदि बिमारिया हो सक्ती है प्रति आक्सिकारक तत्त्व शरीर को इस सभी से बचाते है
ज्वारे को रस शीर्घता से रक्त में  अवशोषित हो जाता है और इसमे विद्यमान क्लोरोफिल रक्त में  मिश्रित हो जाता है १०० मि .लि . रस में ९० से १०० मि .ग्रा . क्लोरोफील होता है
यह आंत्र में विद्यमान लाभप्रद जिवाणूंओ को पोषण देता है
क्लोरोफिल एक  उत्तम किटाणूनाशक है अंतः शरीर में  बने हुए व्रणो का यह शोधन करता है और कई बिमारीओ को पैदा करणे वाले जिवाणूओ को नष्ट करता है
क्लोरोफिल में  फंफूद (फंगस ) रोधी शक्ती है
यकृत की  कार्य  क्षमता को बढता है
शरीर में शोथ  ( इन्फ्लामेशन  )  को दूर करता है इसलिये जोडो के शोथ (आथ्राइट्स ), आंत्रशोथ ,गले में  शोथ ,स्पेंडिंलाइटिस आदि  को शांत करने में सहायक है
यह रक्त निर्माण में  सहायक है
क्लोरोफिल में  विद्यमान मैग्नीसीयम तत्व अस्थि निर्माण के लिये आवश्यक होती है
मैग्निशियम तत्त्व शरीर में  लगभग तीन सौ एन्जाईम्स को सक्रिय बनाने के लिये आवश्यक होता है
नाडीयो ( nerves ) एवं मांस पेशियो   (muscles ) को तनावरहीत (  relaxed )  रखने में  एवं उनके सम्यक रूप से कार्य करने  के लिये मैग्निशियम आवश्यक है
यकृत में बीटा कोशिकाओ द्वारा इन्सुलिन  निर्माण में  मैग्निशियम सहायक होता है
मैग्निशियम अल्पता से रक्तचाप बढ जाता है
स्त्रीयो में  मैग्निशियम की कमी से 'रेस्टलेस लेग  ' (आराम की अवस्था में  भी पैरो में  दर्द  होना ) ,रजोनिवृत संबंधीत समस्याओ ( Menopausal Syndrome ) में  वृद्धी ,मासिक धर्म से पहले मानसिक तनाव में  वृद्धी होती है
शरीर में   कैल्शीयम तत्त्व तथा विटामिन सी का संचालन कऱने में  मैग्निशियम की अहम भूमिका होती है
ज्वारे का रस पीने से गले की खारीश ठीक हो जाती है
दांतो की सडन और मुख की दुर्गंध दूर होती है
अल्प आयु  में  बाल सफेद नहीं होते
त्वचा आभा युक्त बनती है
पाचन शक्ती बढती है
पाचन संस्थान के अंग-प्रत्यंगो का शोधन होता है
मोटापा कम होता है

Post a Comment

2 Comments