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प्रोस्टेट कैंसर -Prostate cancer

प्रोस्टेट कैंसर -Prostate cancer 

प्रोस्टेट कैंसर : पुरुषो में मूत्राशय के निम्नद्वार को घेरे हुए मांस सूत्रो से निर्मित एवं सोत्रिक तंतुओ से आच्छादित गभग २०-२५ ग्राम की दो पार्श्वखंडो से युक्त अखरोट के समान आकृति वाली इस ग्रन्थि में एक प्रकार का रस बनता है जो सफेद चिकना और तरल होता है । सम्भोग के समय शुक्र स्खलन के साथ वीर्य में यह तरल पदार्थ ( रस ) मिल जाता है
prostate cancer
वृद्धावस्था में  पुरुषो को ५५-६० वर्ष को आयु के बाद होने वाले इस रोग का आयुर्वेदिक संहिताओ में स्पष्ट और विस्तृत वर्णन प्राप्त नहीं होता है । सुश्रुत आदी ग्रंथो में अष्टीला , वाताष्टीला , मूत्रग्रन्थि आदी का उल्लेख मिलता है जो पुरुष ग्रन्थि के समान लक्षण वाला है । उपर्युक्त उल्लिखित आयुविशेष में  पौरुष ग्रन्थि में  सुजन होकर वृद्धि हो जाती है , जैसे  ' पौरुष ग्रन्थि वृद्धि ' कहते है ।
पुरुषो में  मूत्राशय के निम्नद्वार को घेरे हुए मांस सूत्रो से निर्मित एवं सोत्रिक तंतुओ से आच्छादित लागभग २०-२५ ग्राम की दो पार्श्वखंडो से युक्त अखरोट के समान आकृति वाली इस ग्रन्थि में  एक प्रकार का रस बनता है जो सफेद चिकना और तरल होता है । सम्भोग के समय शुक्र स्खलन के साथ वीर्य में  यह तरल पदार्थ ( रस ) मिल जाता है । वीर्य में  जो एक विशेष प्रकार कि गन्ध आया करती है वह इसी पौरुष ग्रन्थि के स्राव की होती है । शुक्राणु सदा क्षारीय दशा में  जीवित रहते है , और इस पौरुष ग्रन्थि का स्राव रस क्षारीय चिकना और पतला होता है । इसलिए शुक्राणु इस तरल रस में  सरकते और दौड धूप बडी आसानी से करते है । पुरुषो में  शुक्रकोष का जब क्षय होने लगता है तब पौरुष ग्रन्थि में  वृद्धि होने लगती है । इस अवस्था मी मूत्रावरोध होने  का भय होने  लगता है ।
मूत्र द्वारा अम्लीय हुए मूत्र मार्ग को यह रस क्षारीय बनाता है ।शुक्राणु अम्लीयता में जीवित नहीं रह सकते अतः यह क्षारीय पौरुष ग्रन्थि  स्राव रस उनको जीवित रखता है । पौरुष ग्रन्थि के विशेष पेशीतन्तु सम्भोग के समय मूत्राशय द्वार को रिंग की तरह सकोडकर बंद कर देते है । जिससे वीर्य के साथ मूत्र त्याग नहीं हो सकता , कामोत्तेजना शान्त होने के बाद मूत्रमार्ग पुनः खुल जाता है । इस प्रकार पुरुष में मूत्रमार्ग एवं शुक्र निर्मित मार्ग एक होने पर भी दो अलग-अलग कार्य हो जाते है ।


पौरुषग्रन्थि वृद्धि का मुख्य कारण -

पौरुष ग्रन्थि वृद्धि में पुरुष हार्मोन (टेस्टोस्टेरोन )   की उत्पत्ति कम हो जाती है तथा स्त्री हार्मोन (इस्ट्रोजन ) की उत्पत्ति अपेक्षा कृत कम नहीं होती है । इस हार्मोन असंतुलन से प्राय : दो प्रकार वृद्धि होती है । स्नायु तन्तु - वृद्धि एवं पौरुष ग्रन्थि वृद्धि ।

अन्यान्य कारण -

हस्थमैथुन ,साधारण आघात जैसे - साइकिल (चक्रयान ) घुडसवारी में कठोर वस्तू पर बैठने ,ऊंचे नीचे कुदने , अति मैथुन ,अयोनीमैथुन आदी । मूत्राशय शोथ ,मूत्राशय पथरी , गठीया सुजाक (पूयमेह ) वात एवं कफ उत्तेजक पदार्थ के सेवन से पौरुष ग्रन्थि पर प्रभाव पडता है , परिणामस्वरूप पौरुष ग्रन्थि वृद्धि का कारण बनता है । वीर्य स्खलन वेग को रोकना , कोष्ठबद्धता , चिंतातुर रहना , अधिक मद्यपान एवं दूषित आहार - विहार का सेवन आदी भी पौरुष ग्रन्थि वृद्धि के कारण है ।
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लक्षण -

मूत्रकृच्छता और बारम्बार मूत्रत्याग की इच्छा मूत्र में रक्त , तलपेट (पेंडू ) जांघो के पीछे और मूलाधार अथवा विटप प्रदेश में  दर्द मालूम पडता है , यह स्थाई होता है और  मूत्रत्याग करने पर भी कम नहीं होता । मूत्रकृच्छता में वृद्धि होने पर मूत्रविरोध उत्पन्न हो सकता है , जिसका कुप्रभाव वृक्को पर भी पडता है ।पौरुष ग्रन्थि वृद्धि की आरंभिक अवस्था में सम्भोग की इच्छा प्राय : बढ जाती है । किन्तु बाद में क्रमशः कामशक्ती घटती है तथा नंपुसकता उत्पन्न हो सकती है । पौरुष ग्रन्थि वृद्धि के  पूर्व बार-बार और शीर्घ -शीर्घ मूत्रत्याग की इच्छा होना और मूत्रावरोध , रक्तमेह , मूत्राशय प्रदाह आदी लक्षण प्रकट होते है  

बहुमूत्र -

यह रोग का प्रारंभिक अवस्था में  मिलने वाला लक्षण है । यदी ५५-६० वर्ष की आयु के व्यक्ती रात्री को सामान्य रूप से मूत्रत्याग करता हुआ क्रमशः बार-बार मूत्रत्याग लगे तो यह स्तिथी पौरुष ग्रन्थि में उत्पन्न शोथ की ओर इंगित करती है । इसका कारण शोथ युक्त बढी हुई पौरुष ग्रन्थि के मूत्रमार्ग या मूत्राशय के अंदर की और आ जाना  है । बार-बार मूत्रत्याग और मूत्रत्याग के दौरान मूत्र का रुक जाना ,मूत्रनली में जलन मालुम पडना , जोर लगाने पर कष्ट के साथ दो चार बुंद और मूत्रत्याग होना  जैसे लक्षण पैदा होते है ।

मूत्रकृच्छ -

यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होने वाला लक्षण है । मूत्रत्याग करते समय विलम्ब से बुंद - बुंद करके मूत्रत्याग की प्रवृत्ती होती है । मूत्र की धार निर्बल , पतली हो जाती है जो दूर न गीर कर समीप में गिरती है  ,साथ ही मूत्रमार्ग में जलन और वेदना होती है, मूत्राशय मूत्र से खाली नहीं होता है ।
सुश्रुत में  वाताष्टीला एवं अष्टीला का वर्णन मिलता है जो पौरुष ग्रन्थि वृद्धि के समान लक्षण युक्त है -
शकृन्मार्गस्यं वत्सेश्च वायुरत्नर माश्रितः ।
अष्ठीला वद्धनं ग्रन्थि करोत्य चल मुन्नतम ।।
विण मूत्रानिल सडगश्च  तंत्राध्मानं च जायते ।
वेदना चाप रा वास्तोवाताष्टिलेती तां विदुः
गुदा और मूत्राशय के मध्य में स्थित अपान वायू अष्टीला के समान कठोर ग्रन्थि को उत्पन्न करती है । यह ग्रन्थि स्थिर और ऊंची उठी हुई होती है । इसके कारण मलमूत्र वायू का  अवरोध होता है ,मूत्राशय में आध्मान होता है , वस्ति , मूत्राशय में तीव्र वेदना होती है , इसे वाताष्टीला कहते है ।

निदानार्थ परीक्षा -

रक्त परीक्षा –

अन्तिम अवस्था में देर तक मूत्र रुके रहने से वृक्को द्वारा युरिया पुरी तरह  निकल पाने की अवस्था में  युरिया रक्त में  मिल जाती है जिससे मूत्र विषमयता उत्पन्न हो जाती है और तब रक्त परीक्षा में युरिया की उपस्थिती मिलती है 

मूत्र परीक्षा -

विशिष्ट गुरुत्व कम हो जाता है , मूत्र में पूयकोष (पस सेल्स ) पाये जाते है 

सोनोग्राफी -

पौरुष ग्रन्थि वृद्धि का परीक्षण सोनोग्राफी करके भी किया जाता है  इसमे pelvis  sonography में सोनोग्राफी में प्रोस्टेट का वजन , मूत्रत्याग करने के बाद कितना मूत्र बचता है इस प्रकार से निदान है 


चिकित्सा सूत्र -

यह व्याधि त्रिदोष जन्य होते हुए भी वात श्लेष्मिक  दोषो की प्रधानता वाला रोग है  अंतः मुख्य दोषो को ध्यान में रकते हुए परिस्थिति के अनुरूप इस रोग की  चिकित्सा , चिकित्सा शास्त्र में निर्देशित औषधिया एवं स्वयं अनुभव के अनुरूप करनी चाहिये  आधुनिक चिकित्सा पौरुष ग्रन्थि वृद्धि की सफल चिकित्सा " शल्य कर्म " ही मानती है  किन्तु आयुर्वेदिक औषधियो से पौरुष ग्रन्थि को समाप्त करने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिये ।मेने  अपने चिकित्सा काल में सैकडो रोगियो को सफल चिकित्सा कर आरोग्य किया है  कुछ प्रतिशत (१५%) रोगियो को जब आयुर्वेदिक चिकित्सा से पूर्ण लाभ  मिले तब ऐसी अवस्था में " शल्य कर्म " कराने का निर्देश देना चाहिये 

चिकित्सा –

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नोट -
इसका वर्णन यहा पर केवल मार्गदर्शक हेतू किया है इसका उपयोग वैदयो की सलाह से ले


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