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आमवात -Rheumatoid Arthritis In Hindi

आमवात - Rheumatoid Arthritis

इस बीमारी में, आम और वात दोनों की स्वीकृति के कारण, दृष्टि और प्रकोप से व्याधी उत्पन्न होते हैं। यही कारण है कि इस बीमारी को आमवात कहा जाता है|

arthritis
इसका वर्णन माधवनिदान में विस्तार से किया गया है।वातरक्त में जिस तरह व्यायाम के साथ विदाही अन्नसेवन करणे का कारण बताया जाता है, उसी तरह उसी तरह आमवात में स्निग्ध और अभिष्यंदी आहार लेना महत्व पूर्ण कारण बताया गया है
आमवात और सामवायू इन दोनो के लक्षणो में समानता हुई तो भी दोनो का व्यवच्छेद करने में सक्षम होना चाहिए । सामवायू जैसे हि आमवात में  भी शूल, गौरव, अरुची आदी लक्षण रहते है ।इनके सिवाय आम जिन जिन जगह पे जाता है उन उन जगह पे वेदना, शूल, स्पर्शासहत्व जैसे लक्षण रहते है ऐसे बताके संचारित्वही ने बताया है । ऐसा हुआ तो भी सामवायू में  विशिष्ट ऐसे अधिष्ठान मात्र प्राप्त नही रहते । इसके अलावा आमवात में संधिप्रदेश या फिर अन्य कफस्थाने इन जगह वायुका संश्रय होके  वहा दोषदूष्यसमुर्च्छना हुई होई रहती है और इसीलिये संधिवेदना ये लक्षण  आमवात में  आता है। सामावायू में  ऐसे विशिष्ट स्थान नहीं न रहने से शरीर में कही भी वेदना हो सकते है ।
आमवात हा एक अत्यंत पिडाकर व एसा व्याधी है । मध्यम मार्ग में आश्रय से आमवात उत्पन्न होता है ।

हेतू

'विरुद्धाहारचेष्टस्य मन्दोन्गेर्निश्चलस्य च |
स्निग्धं भुक्तवतो ह्यन्नं व्यायामं कुर्वतस्तथा ||'
 मा.नि./आमवात /1
जिसका अग्नी मन्द रहता है और जो नियमित रूप से व्यायाम नही करता ऐसे व्यक्ती ने विरुद्धाशन भी किया य फ़िर अतिस्निग्ध आहार लेके जल्दिसे व्यायाम किया हो तो आमवात उत्पन्न होता है |

संप्राप्ति

'वायुना प्रेरितो ह्यामः श्लेष्मस्थानं प्रधावति |
तेनात्यर्थं विदग्धोऽसौ धमनीः प्रतिपद्यते ||
वातपित्तकफ़ैर्भुयो दूषितः सोऽन्नजो रसः |
स्त्रोतांस्यभिष्यन्दयति नानावर्नोतिपिच्छिलः ||
जनयत्याशु दौर्बल्यं गौरवं हृदयस्य च |
व्याधिनामाश्रयो ह्येष आमसंज्ञोतिदारुणः ||
'युगपत्कुपितावन्तस्त्रिकसन्धिप्रवेशकौ |
स्तब्धं च कुरुतो गात्रमामवातः स उच्यते ||'
                                                      - मा.नि./आमवात / 2 ते 5

उपर निर्दिष्ट किये हुए कारणो से वातप्रकोप और आमोत्पत्ती या दोनो घटना एकही समय मी शरीर में उत्पन्न हो सकते है ।प्रकुपित वायुसे आम को गती प्राप्त होती है और वो दशधमणीसे पुरे शरीर में संचार करना शुरु कर देता है । श्लेष्मस्थान इस शब्द में आमाशय , संधी , शिरः प्रदेश , कंठ , उरः प्रदेश ये सब अंग अपेक्षित है । धमनी में बहने से ये आम उन जगह के दोषो में अधिक दूषित होता है ।उसे विभिन्न वर्ण प्राप्त होता है और वो अतिपिच्छिल ऐसा रहता है ।ये आम शरीर के अनेक स्रोतसो में क्लेद उत्पन्न करता है । उसकी वजह से दौर्बल्य और हृत्प्रदेशी गौरव जैसी लक्षणे उत्पन्न होते है ।प्रकुपित वात और आम दोनो एकजूट होकर कोष्ठ , संधी और त्रिकप्रदेश इनकी विकृती उत्पन्न करते है ।
रोगोउत्पादन के लिए दोषप्रकोप इतना आमभी महत्वपूर्ण कारण रहता है ।केवल आमवात में हि नहीं तो अन्य रोगो में भी आमोत्पत्ती के सिवाय व्याधिकी निर्मिती नहीं हो सकती । इसीलिये हर रोगो की चिकित्सा करते समय आम के बारे में सोचना क्रमप्रात्प रहता है ।
सुश्रूतोने इन आम के कार्य के वर्णन करते हुए लिखा है


'यत्रस्थमामं विरुजेत्तमेव देशं विशेषन विकारजातैः |
दोषेण येनावततं शरीरं तल्लक्षणैरामसमुदभवैश्च ||'
 _सु . उ . 36

सुश्रूतने किया हुआ ये वर्णन आमवात के वर्णन जैसा ही है ये दिखाई देता है ।आम मतलब अपचित आहार रस होके ' समूलं सर्व रोगाणा' ऐसे इसका वर्णन किया गया है । आम के स्वरूप के बारे में वर्णन करते समय -


' अविपक्वं असंयुक्तं दुर्गधं बहुपिच्छिलम् |
सदनं सर्व गात्राणां आममित्यभिधियते ||'
 _मा.नि./आमवात /5 टिका
ऐसा कहा है . इस आम की वजह से उत्पन्न हुई स्रोतोरोध , बलभ्रंश , गौरव आदी सब लक्षण आमवात में भी उत्पन्न होती है ।

आमवात में संधी विकृती रहती है वो मुख्यतः बड़ी संधि | मणिबंध, कर्पूर, अंस, गुल्फ, जानु, वंक्षण और त्रिक संधि इनकी विकृति अधिक मात्रा में मिलती है |


पूर्वरूपे

आमवात में ज्वर ये लक्षण शुरुवाती समय में अवश्यं भावी होता है।  तीक्ष्णवेगी ज्वर, अंगगौरव,सांधे मानो बांध दिए हो ऐसे आमवात की पूर्वरूपे रहती है | आमवात की शुरुवात हर समय ज्वर से ही होती है |

सामान्य लक्षण

' अंगमर्दोरुचिस्तृष्णा ह्यालस्यं गौरवं ज्वरः |
अपाकः शुनतांगानामामवातस्य लक्षणम् ||
स कष्टः सर्वरोगाणां  यदा प्रकुपितो भवेत् |
हस्तपादशिरोगुल्फ़त्रिकजानुरुसन्धिषु ||
करोति सरुजं शोथं यत्र दोषः प्रपद्यते |
स देशो रुज्यतेत्यर्थं व्याविद्ध इव वृश्चिकैः ||
जनयेत्सोग्निदौर्बल्यं प्रसेकारुचिगौरम् ||
उस्ताहहानिं वैरस्यं दाहं च बहुमुत्रताम् |
कुक्षौ कठिनतां शूलं तथा निद्रविपर्यम् ||
तृट् छद्रिभ्रममूर्छाश्च ह्रुदग्रहं विड् विबद्धताम् ||
जाद्यान्त्रकूजनमानाहं कष्टांश्र्चान्यानुपद्रवान् ||'
_मा.नि./आमवात 6 ते 10


अंग मर्द , अरुचि, तृष्णा, आलस्य, शरीरगौरव, ज्वर, खाये हुए अन्न का पचन न  होना , शोथ ये आमवात की लक्षण है | आमवात के इन सामान्य लक्षणों में संधिशूल ये लक्षण बताया नहीं है | उसकी वजह से ही लक्षण शुरुवाती समय के लक्षण है ऐसा स्पष्ट होता है | याफिर इनको आमवात की पूर्वरूपे कहना ही अच्छा साबित है |
जब व्याधि ज्यादा व्यक्त होता है, ज्यादा प्रवृद्ध होता है उस समय ऊपर के सभी लक्षण ज्यादा मात्रा में व्यक्त होते है , पर उसी बराबर हस्त, पाद, शिर, गल्फ, त्रिक, जानु, उरु इन जगह पर रहे हुए संधि में शोथ और शूल उत्पन्न होता है | उस जगह तीव्र स्पर्शासहत्व, उष्णस्पर्श और आरक्तवर्णता  ये लक्षण रहते है | क्रियाल्पता , सशूलक्रिया या क्रियाहानी ये लक्षण उत्पन्न होता है |
आमवात के साथ संधिशूल और शोथ इनमे संचारित्व रहता है | एक सांधे से दूसरे सांधे के पास इस लक्षण का आवर्तन होता जाता है | आम शरीर में संचार करते समय जिन संधी के पास जाके रुकता हे उस जगह पे शोथ, शूल, आरक्तवर्णता, उष्णस्पर्श, स्पर्शासहत्व ये लक्षण उत्पन्न होते है | पर उसी समय पहले विकृत संधिप्रदेशी में शोथ,शूल और अन्य लक्षण मात्र एकदम से कम होते हुए दिखाई देते है | इसीप्रकार से संचरित्व रहना ये आमवात का एक विशिष्ट लक्षण रहके इस लक्षण के मदत से अन्य संधीशूल  व्याधी से आमवात का व्यवच्छेद करना संभव होता है |
संधिप्रदेशी में होने वाली वेदना ज्यादा तीव्र स्वरुप की और असहय ऐसी रहती है इसीलिए इसकी तुलना वृच्छिक दंश वेदना से की जाती है |
इसके अलावा आमवात में अनेक सार्वदेहिक लक्षण उत्पन्न होते है | अग्निमांद्य, लालास्त्राव, अरुचि, गौरव, उस्ताह हानी, मुखवैरस्य, शरीरदाह , बहुमूत्रता, कुक्षिप्रदेशी काठिण्यऔर शूल, हृदग्रह , मलावष्टंभ, निद्राधिक्य ये महत्वपूर्ण सार्वदेहिक लक्षण है |
आमवात के केवल वातज, पित्तानुबंधी, कफानुबंधी ऐसे प्रकार किये जाते है |



'पित्तात्सदाहरागं च सशूलं पवनानुगम् |
स्तिमितं गुरुकण्डु च कफ़दुष्टं तमादिशेत् ||'
 _मा.नि./आमवात /11


आमवात में पित्तानुबंध रहते समय भी दाह और आरक्तवर्णता , केवल वातज रहते समय भी अधिक मात्रा में पीड़ा और कफानुबंध रहते समय भी त्सैमित्य, गौरव, कंडु ये लक्षण उत्पन्न होते हुए दिखते है |

उपद्रव

'तृट् छद्रिभ्रममूर्छाश्च ह्रुदग्रहं विड् विबद्धताम् ||
जाद्यान्त्रकूजनमानाहं कष्टांश्र्चान्यानुपद्रवान् ||'
_मा.नि./आमवात 10


तृष्णा, छर्दि, भ्रम, मूर्च्छा, हृदग्रह, मलावष्टंभ, आंत्रकूजन, आध्मान ये आमवात के प्रमुख उपद्रव है. इनके अलावा अन्य अनेक उपद्रव आमवात में उत्पन्न हो सकते है |
व्याधी के गंभीर स्थिती, व्याधि जीर्ण हुआ तो हृद्रोग ये महत्वपूर्ण उपद्रव अनेक रोगियों में उत्पन्न होता है | ह्रदय का आकार बढ़ना , ह्रदय की मांसपेशी में विकृति के कारन रसविक्षेपण के कार्य में विरोध लाके विकृत ध्वनी उत्पन रहने , हृत्शूल इन प्रकार के हृद्रोग की निर्मिती आमवात में उपद्रव के स्वरुप में आती है | आमवात की सामान्य संप्राप्ति बताते समय दोष ये कफस्थान के पास जाके उस जगह विकृति उत्पन्न करता है ऐसे कहा गया है |  संधि के जैसे ही ह्रदय ये एक प्रमुख कफस्थान होने के कारन इन रोगो में ह्रदय की भी विकृती उत्पन्न होती है , ऐसे ही इस उपद्रव की उत्पत्ति बताना संभव है |
उदर्क - संधिसंकोच, हस्तपाद वक्रता, हृद्रोग|

साध्यासाध्यत्व

एकदोषज आमवात साध्य , द्विदोषज याप्य , सब शरीरव्यापी , शोथयुक्त और सान्निपातिक आमवात कृच्छ्रसाध्य रहता | उपद्रव विरहित आमवात विशेषतः हृद्रोग उपद्रवात्मक रहते हुए कष्ठसाध्य बनता है |
पुराण आमवात ये भी एक कष्टसाध्य है | 

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