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अन्नपान वर्णन - DIET EXPLANATION

अन्नपान वर्णन - DIET EXPLANATION  

इसमें हमने रोज की खानपान में जो सब्जिया उपयोग में आती है उनके गुणदोषों का वर्णन किया हैअतः हम इसमेसे अपनी शंका अनुसार सब्जियोके और फलो के गुणधर्म जान सकते है इससे हमे किस सब्जी में कोनसे दोष या गुण  है यह पता चलेगा। यह पूरा वर्णन चरक सहिता से लिया गया है अतः यह ऐसे के ऐसा शास्त्र में वर्णन है। 
जिस आहार का वर्ण , गंध, रस, स्पर्श ये प्रिय मतलब रुचिकर रहता है और जो विधीपूर्वक बनाया रहता है ऐसे आहार को विद्वान् लोक प्राणिसज्ञा युक्त प्राणियों का प्राण मानते है।  कारण उनके फल प्रत्यक्ष देखने को मिलते है।  जाठराग्नि की स्थिती ही इस आहाररूपी इंधन पर निर्भर करता है। ये अन्नपान सत्त्वगुण युक्त शक्ती बढ़ाता है।  यही आहार शरीर में सर्व धातुसमुह और बल, वर्ण, इंद्रिये इनको प्रसन्नता प्राप्त करके देता है। समुचित उपयोग और उपभोग करने से वो हितकारक और विधिविपरित उपभोग करने से अहितकारक होता है।


अन्नपान वर्णन - DIET EXPLANATION



हितकर या अहितकर आहार :

इनके लिए कोनसा आहार हितकर और कोनसा अहितकर है ये समजाने के लिए संपूर्ण अन्नपान विधिका , ये अग्निवेश , में अभी उपदेश करता हु।  जल ये स्वभावतः क्लीन्नता उत्पन्न करता है,लवण रस कफादियोंके विलयन करता है , क्षार पाचन करता है , मधुर भग्नोके संधान करता है, तूपसे स्नेहन घडता है, दूध जीवनीय शक्ती प्रदान करता है, मांस स्थूलता उत्पनन करता है। (बृहण करता ), मांसरस तृप्तिकारक रहता है , सुरा शरीरावयो को जीर्ण करता है सिधु ( एक मद्यप्रकार ) मांस , मेद आदि धातुके लेखन करते है , द्राक्षासव अग्नि प्रदीप्त करते है, फाणित ( काकवी ) सब दोषोंका संचय करते है , दही शोथकारक रहती है , पिण्याकशाक ( पिला शेवगा ) ये हर्षनाशक ( सुस्ती लाने वाली ) रहती है , उड़द की दाल की वजह से मल का प्रमाण बढ़ता है, क्षार दृष्टी और शुक्रका विनाश करता है , प्रायः सब अम्लपदार्थ पित्तकारक रहते है , परन्तु डाळिंब और आवला अम्लरस के हो के भी वो पित्तकारक नहीं है , मध - पुराने शाली या षष्टिक जव, गहु छोडके अन्य सब मधुर पदार्थ प्रायः कफवर्धक होते है , वेतका अग्रभाग, गुलवेल पडवल की पत्ते छोडके सब तिक्त पदार्थ प्रायः वातकारक, वृष्यता नाशक ठरते है। पिंपली और सुंठ छोडके प्रायः सब तिक्तरसयुक्त द्रव्य ये वातकर और अवृष्य रहते है।

आहार द्रव्यों के वर्गीकरण :

अभी इसके बाद वर्गसंग्रहानुसार आहार द्रव्यों के विवेचन करते है।  आहार को बारा वर्गों में विभाजीत करके बताया गया है।


  1. शूकधान्यवर्ग
  2. शमीधान्यवर्ग
  3. शाकवर्ग
  4. फलवर्ग
  5. हरितवर्ग
  6. मद्यवर्ग
  7. जलवर्ग
  8. दुग्धवर्ग
  9. इक्षुवर्ग
  10. कृतान्नवर्ग
  11. आहारोपयोगी वर्ग


अथ शूकधान्यवर्ग : -

शूकधान्यवर्ग : 

धान्यो में से लाल शाली , बढे शाली, कलम शाली ( शेलिभात ) , शकुनाहृत , तुर्णक, दीर्घशुक , गौरधान्य, पाण्डुक, लांगूल, सुंगंधित ( आममोहर ), लोहवाल, शालिवा , प्रमोदक(प्रल्हाद भात ), पतंग , तपनीय इस प्रकार के इतर अच्छे जाती के शाली ये शीतवीर्य, मधुर रसके, मधुर विपाकी, किंचित वातकारक , स्निग्ध, बृहण , शुक्रल और मूत्रल रहता है।
ऊपर के सब धान्यों में से लाल शाली ये श्रेष्ट रहते है।  ये तृष्णानाशक और त्रिदोषशामक रहते है। इसके निचे ये गुण बढ़ी शाली में हे , इसेभी कम गुण कमलशाली में रहते है और इसके जैसे ही इतर प्रकारके गुण की मात्रा कम होती है।
यवक,हायन, पानसु , वाप्य , नैषधक आदि जीन शाली , उनमे शाली , महाशाली इनके गुण तथा दोषदृष्टिकोनमेसे समानता दिखाई देती है।
षष्टिक धान्य में शीत, स्निग्ध, लघु, मधुर, त्रिदोषघ्न और शरीर में स्थिरता उत्पन्न करते रहते है। कृष्ण षष्टिक ये उसेभी कम गुणके रहते है।
 वरक, उद्दालक , चीन, शारद, उज्वल, दर्दुर, गंधक और कुरुविंद या और कुछ षष्टिक के जाती है।  ये सब धान्य ऊपर के श्वेत और कृष्ण षष्टिकोसे गुण में कम प्रति के है।  व्रीहि धान्य ये मधुर रस के , अम्ल विपाकी , पित्तवर्धक और गुरूपाकी रहते है।  पाटल धान्य ये मूत्र-मलवर्धक, उष्ण और त्रिदोषकारक रहते है।  कोरदूष ( हरिक), श्यामक ( सार्वे ) ये दोनों कषाय और मधुर रसके , लघु , वातकारक , कफपित्तनाशक, शीतवीर्य , ग्राही और धातुके शोषण करने वाले होते है। हस्तिसावे, नीवार ( देवभात या फिर राणसाली ) , तोयपर्णी , गवेधुक ( कसइके बीज ) , प्रशांतिका ( एक प्रकारके लाल कणिस के देवभात ), जलश्यामक ( पानी में होने वाली सावा ), लोहिताणु , प्रियंगु ( कांग ), मुकुंद ( वाकण तृण ), झिंटी, गर्मुटी ( कर्गोटीका  - ये कोकण में प्रसिद्ध है ), वरुक ( वरई ), शिविर ( सिद्धक ) , उत्कट, जुर्णाव्ह ( जोंधळा ) इन सब के गुण साव्या जैसे ही है।
यव ये रुक्ष, शीत, लघु, मधुर रसके , वातप्रकोपक, मल बढ़ाने वाले रहते है , इनके वजह से शरीर में स्थिरता उत्पन्न होती है, अल्प कषाय गुण होने की वजह से कफ विकार का नाश होता है इससे बलवृद्धी होती है।
बाम्बू से उत्पन्न होने वाले यव ( कळकीके बीज ) ये रुक्ष मधुर रसके, कषाय अनुरसके, कफपित्त नाशक, मेदहारक, कृमीनाशक, विषनाशक और बल्य रहता है।
गहु का संधानकृत ( भग्नादिको जोड़ने वाला ), वातहर , मधुर रसके , शीतवीर्य, जीवनीय, बृहण , वृष्य , स्निग्ध , स्थैर्यकर  और गुरु गुणका रहता है।
नन्दीमुखी  तथा मधुली ये दोनों धान्य मधुर, स्निग्ध और शीतवीर्य रहते है।

अथ शमीधान्य वर्ग :

शमीधान्यवर्ग :

मुग ये कषाय और मधुर रस के , रुक्ष, शीतवीर्य, कटु विपाकी , लघु , विशदि , कफपित्तनाशक रहते है।  सूप ( दाल के वरण में ) ये सर्वोत्तम रहते है। एकंदर शमी धान्य में मुग ये श्रेष्ट है।
उडीद ये अत्यंत वृष्य , वातहर, स्निग्ध , उष्णवीर्य, मधुर रसके , गुरूपाकी , बलवर्धक , पुरिषवृद्धी करने वाले और तत्काल पुरुषत्व प्राप्त करके देने वाले रहते है।
राजमाष ( चवली ) ये सर , रुचिकारक, कफनाशक,शुक्रनाशक, अम्लपित्त नाशक रहते है।  ये स्वादु ( मधुर रसयुक्त ) , वातवृद्धिकर , रुक्ष , कषाय और गुरु रहते है।
कुलिथ ये उष्णवीर्य, कषाय रस प्रधान , अम्ल विपाकी , कफ, शुक्र व वातनाशक , ग्राही , कास, श्वास, हिक्का इन रोगोपर हितकारी रहते है।
मटकी ये मधुर रसात्मक , मधुर विपाकि ग्राही, रुक्ष और शीतवीर्य रहता है।  रक्त पित्त और ज्वर इन व्याधियों में इनका प्रयोग श्रेयस्कर रहता है।
हरभरे , मसूर, लाख, मटार, ये लघु , शीतवीर्य,मधुर  और कषाय रसके होके उनके सेवन से शरीर में रुक्षता प्राप्त होती है।  पित्तज और कफज रोगोमे सूप ( वरण बनाने के लिए ) ये श्रेष्ट माना जाता है।  इनमे से मसूर अत्यंत संग्राही व् मटार ये अत्यंत वातकारक रहता है।
तील ये स्निग्ध, उष्णवीर्य, मधुर, तिक्त, कषाय, कटुरस युक्त रहता है ये त्वचा और बालो के लिए हितकारक होके बल्य , वातनाशक व् कफपित्तवर्धक रहता है।  जिनपे उल्लेख नहीं किया ऐसी शिम्बी धान्य भी सामान्यतः मधुर रसकी , शीतवीर्य, गुरु, बलनाशक और लक्षताकारक रहते है।  बलवान पुरुषोने इनका प्रयोग स्नेहा के साथ करना चाहिए।
शिम्बी धान्य गुण :
शिम्बी धान्य ये सामान्यतः रुक्ष , कषाय रस की होके उनकी वजह से कोष्टोमे वातप्रकोप होता है।  ये धान्य अवृष्य तथा नेत्रोको अहितकारक रहता है। इनका सेवन करने से अवष्टम्भ होके उसका पचन बाद में होता है।
तुअर की दाल ये कफ पित्तनाशक तथा वातवर्धक रहता है।
अवल्गुज ( बावची ) ,एैडगज ( चक्रमर्द ) ये कफवात नाशक रहता है।  वाल ये पित्तवर्धक रहता है।  काकाण्डोम ( शुकरशिम्बी ) और कवच बीजके गुण ये उडीद जैसे रहते है।

अथ शाकवर्गः -

शाकवर्ग :

पाठा ( पहाड़ ),शुषा ( कासविंदा ), शटी ( कचोरी ), वास्तुक ( चाकवत) और सुनिषण्णक (कुरडू ) इनकी सब्जी ग्राही और त्रिदोषशामक रहता है।
इनमे से चाकवता की सब्जी मात्र भेदक मतलब मल का खड़ा तोड़के रेचक कार्य करने वाली होती है।
काकम की ( कांगोणी ) की सब्जी त्रिदोषशामक, वृष्य, रसायन, बहुत शीत, या बहुत उष्ण नहीं ऐसी साधारण वीर्य होने वाली, भेदिनी या  कुष्ठ नाशक होती है।
राजक्षवक ( दूधिया कद्दू )  इसकी सब्जी त्रिदोषनाशक , ग्राही, लघुपाकी होके ग्रहणी या अर्श विकारो के लिए विशेष लाभप्रद रहते है।
कालशाक कटु , दीपन, विषनाशक या शोथघ्न रहता है।
कलायशाक ( मटार ) , लघुपाकी , उष्णवीर्य , वातकर और रुक्ष रहती है।
खट्टा चुकये की सब्जी अग्निवर्धक , उष्णवीर्य, ग्राही, कफज तथा वातविकार, ग्रहणी या अर्श इनके लिए लाभदायी रहता है।
उपोदीका ( थोर मायाली ) की सब्जी मधुर रसकी , मधुर विपाकी, भेदिनी, कफवर्धक, वृष्य, स्निग्ध, शीत, और मदनाशक रहती है।
तांदुळजा की सब्जी ये रुक्ष, मदनाशक, सब प्रकार के स्थावर और जंगम विषका नाश करने वाली होके रक्तपित्तमे हितकर रहती है।  ये सब्जी मधुर रस की , मधुर विपाकी और शीतवीर्य रहती है।
मंडूकपर्णी, वेताके नए वाले कोम्ब , कुचेला ( पाठा - पहाड़), वनतिक्तक ( काडेचिराईत ) , कर्कोटक ( कारली ), अवलगुज ( बावची ), पटोल ( पडवळ ), कुटकी,अडुलशे की फूल , शाङ्र्गेष्टि ( काकजंघा ) , केम्बुक ( केबुक ), कठिल्लक , पुनर्नवा ( घेटुली ) , नाड़ीशाक , कलाय ( मटार ), गोजिह्वा ( पाथरी ) , वांगी , तिलपर्णी ( हुलहुल ), कुलक ( पटालभेद ), कर्कश ( कर्कोटक ) , कडुनिंब और पित्तपापड़ा इनकी सब्जी कफपित्तनाशक , तिक्त रस की, शीतवीर्य या कटु विपाकी रहती है।
सुप्यशाक :
सब प्रकार के सुप्यशाक मतलब जिनके दाल बनाते है ऐसे द्विदल धान्य है।  ये मुग , उडिद वग़ैरों की पत्ते , फज्जी ( फांद ), चिल्ली ( चंदनबटवा ), कुतुंबक (गुमा ) , बटाटे-रताली-पेन्डालू आदि कंदमूल की पेड़ो की पत्तिया , रानचाकवत , शण और सावरीकी फूल , सफ़ेद कांचन , सूर्यफुल , पावटा ये सब शेंग , लाल कांचन, पाचोंदा , उंदिरकानी , जीवशाक , लोटाक , पालक , माठ ,राजगिरा , नालिका, मोहरी, कड़ई, भुईशिरस, जेष्ठमध , टाकळा, कमलमृणाल, नांदरुखी, घोळ , यवशाक ( क्षेत्रचाकवत ), कोहळा , बावची सफ़ेद सालवण , शालकल्याणी, लाल लाजाळु , दूधी मोरवेल ये सब  सब्जिया गुरूपाकी , रुक्ष , विष्टम्भकर रहते है।  ये मधुर रस के, शीतवीर्य और मलभेदक रहते है।  सब्जी पकाके उनमे का रसनिचोड़ के उसमे से निकलनेवाला रस ये तूप बराबर लेना हितकर रहता है।
शण, लाल कांचन, सफ़ेद कांचन, सावर ९ शाल्मली ) इनके फूल स्तंभक रहते है।  ये फूल रक्तपित्तके लिए विशेष गुणकारी है।
वड, उम्बर, पिंपली और कमल इनके पत्ते कषाय रस के , स्तंभक , शीतवीर्य होके पित्तातिसार में हितकर रहता है।
गुलवेल की सब्जी वातहर रहती है।
गण्डिर ( कडु सुरन ), चित्रक की सब्जी कफनाशक रहती है।
श्रेयसी ( गजपिंपली ), बिल्वपर्णी और बेलकी पत्ते इनकी सब्जी वातनाशक रहती है।
भंडी, शतावरी, चिकणा, जीवन्ती, पर्वणी ( पर्वशाक, इंद्रवारुणी ), पर्वपुष्पी ( नागाली ) , कुक्कुटी इनकी सब्जी वातपित्तनाशक रहती है।
लांगूल ( खड्यानाग ) या लाल एरंड के पत्तो की सब्जी लघु, रेचक या तिक्तरस के रहती है।  तील , सफ़ेद एरंड की सब्जी , वेत ये वातकर , कटु-अम्ल रसकी , विरेचक है।  कर्डई के पत्तो की सब्जी रुक्ष , अम्ल रसकी , उष्ण , कफनाशक और पित्तवर्धक रहती है।  थोरले तवसे , वालुक इनकी सब्जी मधुर रसकी , गुरु, अवष्टंभ करने वाली और शीतवीर्य रहती है।  इनके अलावा तवश की सब्जी , मुखप्रिय, रुक्ष , मूत्रल रहती है।  पके हुए वालुक ये दाहप्रशमन , तृष्णाशामक या श्रमहर रहती है।  दूधी कद्दू की सब्जी ये विरेचक , रुक्ष , शीतवीर्य और गुरु रहती है। चिबुड और कच्चा खीरा रेचन करने वाली है कोहळा ये क्षारयुक्त , मधुर - अम्ल रस का , लघु , मलमूत्र विरेचक और त्रिदोषनाशक रहता है।
केलूट ( केवुक प्यास  ), कंदब, नदीमाषक ( उन्दीमानवक ), और ऐन्दुक इनकी सब्जी ये विशद , गुरु , शीत और कफकारक रहती है।
नीलकमल ये कषाय रस के और रक्तपित्तनाशक है। ताड़के अंकुर येभी यही गुण के होके उरः क्षतनाशक रहते है। खजूर और ताड़गोले रक्तपित्त और क्षयरोग नाशक रहता है।
शतपत्र कमलका प्यास , कमलके देठ, लाल अष्टदल कमलका कंद , डुक्करकंद , कशेरुक, शिंगाड़े, निले कमलका कंद , ये सब गुरु , स्तंभक और शीतवीर्य है , कुमुद और निले कमलके देठ, फूल और बीज ये शीत वीर्य , मधुर-कषाय रसकी और वात-कफवर्धक रहते है। पुष्करबीजका रस और विपाकी मधुर होके वो किंचित कषाय रस का , अवष्टंभक और रक्तपित्तनाशक है।
खारा रानसूरण , बल्य , शीत , गुरु , स्निग्ध , तृप्तीकर , बृहण , वातपित्तनाशक , मधुर और वृष्य रहता है।
भुईकोहळा जीवनीय , बृहण ,वृष्य , कण्ठ्य , रसायन, बल्य , मूत्रल, मधुर रसका और शीतवीर्य रहता है।
अल्मिका कंद ( चक्रदत्ताके मतानुसार ये आसाम में होने वाला एक कंद है।  गंगाधर शास्त्रियों के मतानुसार ये खट्टे जाती के अद्रक का प्रकार है। ) ये ग्रहणी और अर्श इनके लिए हितकर , लघु, अतिउष्ण, कफवातनाशक, स्तंभक और मदरोगापर प्रशस्त है।
शिरस की सब्जी त्रिदोषकारक और मल-मूत्र का अवरोध करता है।
सफ़ेद रताली ये इन गुणधर्मो की ही है।  परन्तु कंदवर्ग में होने के कारण खाने में अति रुचकर लगता है। सर्पछत्र ( आलभे )  छोडके बाकी सब छत्रजाति की सब्जी ये शीत , पीनस उत्पन्न करने वाली मधुर और गुरु रहती है।

अथ फलवर्ग :

फलवर्ग :

किसमिस ये तृष्णा , दाह , ज्वर, कास , रक्तपित्त , क्षत , क्षय वात , पित्त , उदावर्त, स्वरभेद , मदात्यय, तिक्तास्यता , मुखशोष और कास इनका त्वरे से नाश करता है। किसमिस बृहण , वृष्य , मधुर, स्निग्ध और शीतवीर्य रहता है।
खजूर ये मधुर, बृहण , बल्य , वृष्य, गुरु , शीत होके क्षय, अभिघात , दाह और वात - पित्त विकारो के लिए हितकर रहता है।
फल्गु ( अंजीर ) ये तर्पण , बृहण , गुरु, विष्टंभी , शीत रहता है।
फालसा ( उम्बर ) येभी उपर के गुण के होते है।
मोह के फूल भी इन गुणों के रहते है इसके अलावा वो वात - पित्त विकारो के लिए प्रशस्त है।  आम्रातक ( मधुर रस का अम्बाडा ) , ये मधुर रस का बृहण , बल्य , तर्पण , गुरूपाकी , स्निग्ध , कफकर , शीत , वृष्य हो के इनको पचन के लिए बहुत समय लगता है।
पके हुए ताड़फल ( ताडगोळे ) और नारल ये बृहण स्निग्ध , शीत , बल्य और मधुर रस के रहते है।
भव्य (करमर ) ये फल मधुर-अम्ल-कषाय रसकी , विष्टंभकर , गुरु , शीत , पित्त-कफवर्धक , ग्राही होके मुख स्वच्छ करने वाली रहती है।
खट्टा फालसा , अंगूर , बोर , आरूक ( कईओ के मतानुसार आड़ू , गंगाधर शास्त्रि के मतानुसार आलूबुखारा ) शृगाल बोर ( चणियाबोर ) , और वडहर ये फल कच्चे खाये हो तो कफ - पित्त बढ़ता है। पके हुए आरूक फल ये बहुत उष्ण ( नात्युष्ण ) नहीं होके गुरु, मधुर रस के, रुचकर रहता है। ये बृहण , शीघ्रपाकी होके बहुत से दोषवर्धक नहीं।
पारावत ये २ प्रकार के होते है १ मधुर , २ अम्ल। इनमे से मधुर रस के फल ये शीत तो अम्ल रसके फल उष्णवीर्य रहते है।  पारावत ये गुरु , अरूचिनाशक और अत्यग्निनाशक रहते है।  ( पारावत मतलब पेरू ऐसा मतलब कुछ लोग लेते है ) शिवणफल ये करमरा जैसे पर अल्पगुण ऐसा रहता है।  तुद ( शहतूत ) इसका गुण परुषक ( फालसा ) जैसे ही है।  कच्चा शहतूत अम्ल रसका रहता है।
टंकफल ( नासपाती ) ये कषाय , मधुर , वातकर , गुरु और शीत रहता है।
कच्चे कवट ये कंठघ्न( आवाज बिगाड़ने वाले ) और वातकर रहता है।
पके हुए कवट अम्ल , कषाय ऐसा मिश्रित स्वादके और सुगंधित होक रुचकर लगते है।  वे त्रिदोषनाशक और गुरु है।  कच्चे या पके हुए ये दोनों अवस्था में कवठ ये ग्राही और विषनाशक रहता है।
पके हुए बेलफल ये पचाने को बहुत जड़, दोषवर्धक और दुर्गंधयुक्त अधोवायु निर्माण करने रहते है।  वोही कच्चा लिया तो स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण, दीपन और कफवातनाशक रहता है।  मल-मूत्रादिके स्तंभन करने का गुण दोनों में समान है।
आम की कच्ची कैरी ये वात - पित्तकर है।  कोय पूरी होने पर कच्ची कैरी अत्यंत पित्तकर रहती है।  आम पका हो तो वातनाशक , मांस - शुक्र- बलप्रद बनता है।
पके हुए जांभूळ कषाय - मधुर  रस के , गुरु , अवष्टंभ करने वाले , शीत , कफपित्तशामक , स्तंभक और अत्यंत वातकर रहता है।
ताजे गीली बोरे ये मधुर , स्निग्ध , भेदन , वातपित्तहर रहती है।  सुखी हुई बोर ये कफनाशक और पित्त को अवरोध करता है।
सफरचंद कषाय - मधुर रसके , शीतवीर्य , स्तंभक रहते है। गांगेरुकि (नागबला ), क़रीर ( नेवती ), बिम्बी ( तोडली ), तोदन (तोरण ) , और धन्वन ( धामनी ) इनके फल मधुर कषाय रसकी , शीत , पित्तकफनाशक रहते है।
पका हुआ फणस , केली , खिरणिके फल ये मधुर , किंचित कषाय , गुरु रहते है।
लवली फल ( हरफारेवड़ी-रायआवला ) ये अम्ल , कषाय , विशद , सुगंधित होने के कारण रुचिकारक होते है।  वे वातुल होके उनका अचार , चटनी आदि करते है।
नीम ( कदम्ब ), शताव्हक  , अक्रोड , केवड़ा , बेहकल और पानआवलीके फल दोषनाशक और विषहारक रहते है।
इगुंदी ( हिंगनबेट ) ये कडवट मधुर रस के ,  स्निग्ध , उष्ण , कफवातनाशक है।
टेम्भुर्नीके फल कफपित्तनाशक , कषाय - मधुर रसके और लघु रहते है।
आंवले में लवण रस छोडके अन्य पांच रस है।
आवला ये स्वेद , मेद , कफ और पित्तरोग नाशक होता है।
बेहड़ा ये रुक्ष, मधुर,-अम्ल -कषाय रसका , उत्तम कफपित्तनाशक और रस-रक्त-मांस-मेद इनमें से दोष नष्ट करने वाला होता है।
अनार ये अम्ल , कषाय, मधुर रसका , वातनाशक , स्तंभक , दीपक, स्निग्ध , उष्ण , रुचीकर और कफपित्ताशी अविरोधी होता है।
अनार के दो जाती है १ खट्टा और २ मीठा इनमे से
खट्टा अनार पित्तनाशक, वातनाशक और कफसे अविरुद्ध मतलब त्रिदोषहर रहता है। इसके लिए मीठा अनार सर्वोत्तम माना जाता है।  ग्राही, दीपन और रूच्य ये गुण दोनों प्रकार के अनार में है।
वृक्षाम्ल ( कोकम , रातांबे ) ये स्तंभक, रुक्ष, उष्ण, वातकफघ्न है।  पके हुए इमली के गुण कोकम जैसे ही है।
अम्लवेत्तस के गुण इमली के जैसे ही है।  अतिरिक्त ये भेदनही है।
महालुंग के केशर शूल, अरुचि, अवष्टंभ, मदाग्नि, मदात्यय, हिक्का, कास, श्वास, छर्दि और वातकफज रोगांमध्ये तसेच मलविकारांमध्ये ये उपयुक्त रहते है।  वे लघु गुण के है।
महालुंग की छाल गिर ये गुरु और वातप्रकोपक है।
कचोरी`के फल बिना छिलके वाले रहे तो वो रूच्य, दीपक, हृद्य, सुगंधित, कफवातनाशक और श्वास, हिक्का, अर्श इनपर हितकर होते है। 
नारींग ये मधुर - थोड़ा अम्ल रस के, हृद्य, रुचकर, पचाने के लिए कठिन,गुरु और वातनाशक रहता है। 
बादाम, पिस्ता, अक्रोड, दंतीफल, सरलफल, उरुमाण (वावरणा फल ) ये सब गुरु, उष्ण, स्निग्ध, मधुर, बल्य, वातघ्न, बृहण, वृष्य, कफपित्तवर्धक रहते है। 
प्रियाल ( चारोळी ) इनमे भी उष्ण छोडके अन्य सब गुण बादाम जैसे ही रहते है। 
श्लेष्मातक ( भोकर ) ये कफ कारक , मधुर , शीत और गुरूपाकी है। 
अंकोल फल कफकर, गुरूपाकी, विष्टम्भी होके बढ़ने वाली अग्निको सामावस्था प्राप्त करके देते है। 
शमी फल ये गुरूपाकी, उष्ण, मधुर, शीत, असून बालो को अहितकर ( बाल झड़ने वाले ) होते है। 
करंज फल ये विष्टंभकर, वातकफ के साथ अविरोधी रहता है। 
आम्रातक  ( खट्टा आंबाडा ), इडलिंबू, करवंद और ऐरावत ( नारंगी ) ये फल रक्तपित्तनाशक है।  वार्ताक ( बेंगन ) ये कटु तिक्त   रस के ,वातनाशक और दीपन है। 
पित्तपापड के फल ये वातकारक, कफपित्तनाशक रहता है।  आक्षिकी फल ये पित्त-कफनाशक, वातकर रहता है। 
पिंपल, उम्बर, प्लक्ष ( पाकर ), न्यग्रोध या महावृक्षों के फल कषाय, मधुर, अम्लरस के, वातकारक और गुरूपाकी रहते है। 
भल्लातकास्थि ( गोडांबी ) ये अग्निसमान तीक्ष्ण है। बिब्बए  के छिलके और गिर मधुर और शीत रहता है।

अथ हरितवर्ग :

हरितवर्ग :

अदरक ये रोचन, दीपन, वृष्य होके इनका रस कफ-वात विकारों में उत्पन्न होने वाला विबंध दूर कराता है। 
लिंबू रोचन, दीपन, तीक्ष्ण, सुगंधयुक्त, मुखशुद्धीकर कफवातनाशक, कृमिनाशक और पाचक रहता है। 
कोवली मूली ये त्रिदोषहारक रहती है।  जून मूली ये त्रिदोषकारक तेल में तली हुई  ( तेल में भुना हुई  ) मूली ये वातनाशक रहती है शुष्क - सूखी हुई मूली ये कफवातनाशक रहती है। 
काली तुलसी हिक्का, कास , विषरोग, श्वास, कुक्षीशुल, पार्श्वशूल नष्ट करने वाली, पित्तकर, कफ-वातनाशक और शरीर दौर्बल्य नष्ट करने वाली होती है।  
ओवा, सफ़ेद तुलसी, शेवगा, शालेय ( बड़ीशोप या फिर कोवली मूली ) और राई ये सब हृद्य, रुचिकर और पित्तप्रकोप रहता है। 
गण्डीर, पाणपिम्पली, तिरफल, पाथरी ये सब द्रव्ये कटु, रुक्ष, कफवातनाशक रहते है।  
सुगंधी रोहिषवत ये पुरुषत्वनाशक, कटु, रुक्ष, उष्ण व मुखशुद्धीकर रहती है। 
काले जीरे कफवातनाशक और बस्तिरोग और बस्तिरूजा नहीं सा करता है। 
कोथिंबीर, अजगंधा (तीलवन ), सुमुख ( वैजयंती तुलसी ), ये रोचक होके बहुत तीखा नहीं होता वैसेही दोषो का उत्क्लेश करने वाला होता है।  
गाजर ये ग्राही, तीक्ष्ण, वातज और कफज अर्शमें हितकर रहता है।  ये स्वेदन होके पित्त प्रकृती का व्यक्तीत्व में इसका प्रयोग नहीं करे।  
प्यास ये कफकारक , वातनाशक होके वो पित्तकारक नहीं होता।  आहारमे इतर द्रव्य बराबर मिलाके इनका प्रयोग किया जाता है। ये बल्य, वृष्य और रुची बढ़ाने वाला रहता है। 
लहसुन कृमी, कुष्ठ, किलासनाशक, वातविकार तथा गुल्म विकार नाशक रहता है। ये स्निग्ध , उष्णवीर्य, कटुरसात्मक, गुरूपाकी और वृष्य रहते। 
ये हरित वर्ग में जीन अद्रक , फल और कंद का उल्लेख किया गया वो सब शुष्क होनेपर वात और कफनाशक रहता है। ऊपर वर्णित सब गुण ये आद्र द्रव्यों के गुण है। 

अथ मध्यवर्ग :

मध्यवर्ग :

मद्य वर्ग सामान्य गुण : स्वभावतः च सब प्रकारकी मद्ये ये मधुर रसात्मक , मधुर विपाकी और उष्ण वीर्य असतात।  उनके विशेष गुण अब बताया गया है। 
सूरा ही कृश व्यक्तीको , मूत्रसंग होते हुए, ग्रहणी, अर्श विकारो के लिए लाभदायी होते। ये वातनाशक होके स्तन्यकर असते। रक्तक्षय के लिए सूरा प्रयोग हितकर रहता है। 
मदिरा मतलब सुर के उपर का स्वच्छ भाग।  ये हिक्का, श्वास, प्रतिश्याय, कास, मलावष्टंभ, अरुचि, छर्दी, आनाह और विबंध रोग में हितकर रहता है, वो वातनाशक भी है।  
जगल मतलब सुर के नीचे का रहने वाला दाट ऐसा भाग।  जगल ये शूल, प्रवाहिका, आटोप, सब प्रकार के कफज और वातज विकार, अर्श इन रोगोके लिए हितकर रहता है। ये ग्राही, रुक्ष, उष्णवीर्य, शोथघ्न और पाचन रहता है। 
अरिष्ट ये शोथ, अर्श, ग्रहणी, पांडु, अरुचि, ज्वर और कफज व्याधी का नाश करने वाला होके वो दीपन और रोचन रहता है। 
शार्कर मतलब शक्कर से बनाया हुआ मद्य।  ये स्वादिष्ट, सुखमद निर्माण करने वाले, सुगंधी होके बस्ति विकार दूर करने वाले , खाये हुए अन्न का जरण करने वाले, पाचन के बाद हृद्य और वर्ण्य होते है। 
पक्वरस-(सीधु ) गन्ने का रस पकाके उससे बनाया मद्य ये रोचन, दीपन, हृद्य होके शोष , शोथ, अर्श, स्नेहजनित विकार और कफ विकार का नाश करने वाले होके वर्ण्य रहता है।  
शीत रस ( गन्ने को न पकाते हुए किये जाने वाला मद्य )- ये खाये हुए अन्न का जरण करने वाला, विबंध नाशक, स्वर- वर्ण विशोधन, लेखन होके , शोथ, उदर, अर्श विकार में हितकर रहता है। 
गौड़ ( गुड़ से बनाया हुआ मद्य )- ये मलभेदक, अपान निस्सरन को मदत करने वाला, तर्पण और दीपन रहता है। आक्षिकी ( बेहड़े से बनाया हुआ मद्य ) ये दीपन होके पांडु और व्रणरोग में हितकर रहता है।  
सुरासव मतलब जिनमे पानी जगह मद्य का उपयोग करते है वे अत्यंत मदकारक, वातनाशक और अत्यंत रूच्य रहते है।  
मध्वासव ( मोह के फूल से बनाया गया आसव ) ये दोषोंका छेदन करने वाला और तीक्ष्ण रहता है। 
मैरेय  ( आसव और मद्यके मिश्रण ) ये मधुर और गुरूपाकी रहते है। 
धायटिके फूलो के मदत से बनाया गया मद्य ये हृद्य, रुक्ष, रोचन और दीपन रहता है। 
किसमिस और गन्ने का रस इनसे बनाया गया मद्य का गुण मध्वासव जैसे ही रहता है।  परंतु माध्विका जैसे इसमें अतितीक्ष्णता नहीं रहती। 
मधुमद्य ( शहद से बनाई गयी ) ये रोचन, दीपन, हृद्य, बल्य, पित्त अविरोधी, विबंध नाशक, कफघ्न , अल्प वातकारक और लघु गुणके रहते है। 
यवसे बनाई गई मंडसहित सूरा ये रुक्ष,उष्णवीर्य,वातपित्तवर्धक होक उत्कृष्ट पाचन करने वाली और मलावष्टंभ करने वाली होती है। 
गेहू से बनाई गयी सूरा कफकारक रहती है। 
सौविरक और तुषोदक ये दोनों द्रव्ये दीपन, पाचन, हृद्रोग-पांडु- कृमिरोगनाशक होके ग्रहणी और अर्श इन रोग में हितकर रहता है।  ये दोनों द्रव्य मलभेदक है। 
अम्लकांजिक इसके केवल स्पर्शसे दाहजनीत ज्वर नष्ट होता है।  इसका पान किया तो वात और कफज विकार नष्ट होता है। वो विबंधघ्न इसीलिए अवस्त्रसी मल, मूत्र, स्वेद निष्कासन करने वाली , वो उत्कृष्ट दीपन भी रहती है। प्रायः सब प्रकारके नए मद्य ये गुरु और सब दोष बढ़ाने वाले होते है , इसके विपरीत प्रायः सब पुराण मद्य ये स्त्रोतोंशुद्धीकर  , दीपन, लघु, और रोचन रहता है। 
यथाविधी मद्यसेवन गुणः यथाविधी मद्य सेवन करने से वे मद्य हर्षण, प्रियण, भय, शोक, और श्रमहर, प्रगल्भता बढ़ाने वाले रहते है।  उसकी वजह से प्रतिमा, मन संतोष, तुष्टि, पुष्टि और बलवर्धन होते है।  अगर सत्वगुण प्रधान मनुष्य  ने इसका सेवन किया तो मद्य ये अमृतसमान गुणदायी रहता है। 

अथ जलवर्ग :

जलवर्ग :

 आकाशमेसे इन्द्रसम्बन्धी मतलब मेघद्वारे गिरने वाली बारिश का पानी ये सब एक ही प्रकार का रहता है। 
ये गिरने वाला बारिश का पानी भूमी, पर्वत, नदी आदी जीन प्रदेश में गिरता है वो देश और काल की अपेक्षा रखके तदनुसार गुणधर्मो में परिणत होता है।  
अंतरिक्ष जल : आकाश में से गिरने वाला पानी ये देश , काल इनका अनुकरण करने वाले सूर्य, चंद्र और वायु इनके संपर्क में आके वैसे पृथ्वी के गुणानुसार शीत , उष्ण, स्निग्ध, रुक्षादि गुणयुक्त बनता है। 
आकाश में से गिरने वाला पानी सब एकही प्रकार का रहता है।  परंतु देश कालानुसार बाद में उसमे अन्य गुण प्रविष्ट होते है।  सुश्रुताने इसके बारे में विशेष वर्णन सूत्र स्थान के पच्चीस वे अध्याय में किया है।  अश्विन महीने में गिरने वाले बारिश के पानी में कालमहिमे नुसार धूल याफिर विषद्रव्ये बहुत कम रहते है।  हारितोने भी कार्तिक और अश्विन इन महीनो में अंतरिक्षजल ग्राह्य रहता है ऐसा कहा है। जतूकर्णों ने बारिश के मौसम में बारिश का पानी ये किट और विषजुष्ट रहता है ऐसा बताया गया है। यही जल शरद ऋतु में अगस्ती तारो के उदय के बाद निर्विष होते है ऐसा बताया गया है। अगस्ती उदय से निर्विष किया हुआ पानी को ' हंसोदक ' कहा गया है। 
अंतरिक्ष जल ये शीतवीर्य, शुद्ध, शिव मतलब कल्याणकारक, मृष्ट-प्राकृतिक अवस्था में से शुद्धता, विमल,लघु इन छह गुणों से युक्त रहता है। 
आकाश में से गिरने वाला पानी ये जलपात्र मतलब स्थानो के अनुसार गुणों की अपेक्षा करते है।  मतलब जिन स्थानों पे वो गिरते है तदनुकूल गुण उनमे आते है। सफ़ेद जमीन पर गिरा हुआ पानी ये कषाय रस के सफ़ेद , पिले जमीन के उपर का पानी तिक्तरस का , पिंगट जमीन के उपर का पानी ये क्षार युक्त , खारा जमीन के उपर का पानी खारा , पर्वत के उपर का पानी कटुरस का और काली जमीन के उपर का पानी मधुर रस का बनाते है।  जमीन के ऊपर गिरने वाले पानी के यह छह गुण है। 
बारिश के, दवा के, और बर्फ के पानी इनमे कोनसा भी रस व्यक्त रहता नहीं।  आकाश मेसे मेघद्वारे गिरा हुआ पानी और नदी वगैरे पात्र में एकत्रित होने वाला जो जल रहता है   उसे ऐद्रजल ऐसा कहते है।  ये उत्तम जल राजे लोग को  पीने के योग्य रहता था। 
सब प्रकार के उत्तम जल में सूक्ष्म, विशद और लघु रहता है।  ये रुक्षता रहित और कफकारक नहीं होणारे रहते है।
वर्षा ऋतु में का नया पानी ये गुरु, कफकारक और मधुररस का होता है।  शरद ऋतु में का जल ये सुकुमारों के लिए और भोजन के समय स्निग्ध पदार्थ अधिक लेनेवालों के लिए भक्ष्य, भोज्य, पेय इनके लिए उपयोग अच्छा रहता है। 
हेमन्त ऋतु में का जल ये स्निग्ध , वृष्य , बल्य और गुरु रहता है। 
वसंत ऋतु मे जल कषाय , मधुर रसका और थोडासा रुक्ष रहता है। 
ग्रीष्म ऋतु में का जल ये अभिष्यंदी नहीं ऐसा निश्चय पूर्वक बताया जाता है। 
इसप्रकार ऋतु के अनुसार मिलने वाले का गुण बताया गया है।  विपरीत काल में बारिश का पानी ये दोषकारक रहता है , इसमें कोनसा भी संदेह नहीं। 
राजा, राजसमान अन्य ( जहागिरदार , सरदार। .) लोग और सकुमार प्रकृती के पुरुष शरद ऋतु में जमा किया हुआ पानी का उपयोग करते है। 
हिमालय में उगम होने वाले देवता और ऋषीद्वारा सेवित, पथरोंसे टक्कर देते हुए , उसलके, उडी मारके बहने वाला नदी का पानी ये पथ्य ( हितकर ) और पुण्यप्रद ( पापरोग नाशक ) रहता है। 
मलय पर्वत में उगम होने वाली नदी का पानी अपने बहाव के साथ खड़क के छोटे टुकड़े और वालू भी बहाके ले जाती है।  इन नदी यो का पानी निर्मल और अमृतसमान लाभदायी रहता है। 
पश्चिमाभिमुख नदियों का पानी निर्मल और पथ्यकर रहता है।  पूर्वसमुद्रा के पास जाने वाले नदीका पानी मंद गती से बहता है और वो गुरु रहता है। 
परियात्र, विंध्य और सह्याद्रि पर्वत पे उगम होने वाली नदी के पानी की वजह से शिरोरोग, कुष्टरोग और श्लीपद ये रोग उत्पन्न होते है।  
वर्षा ऋतु में नदी के पानी के साथ जमीन के ऊपर के किटक, सर्प, चूहे इनके मलभाग और अन्यप्रकार के मल भी बह के वो भी  पानी में सबदोष का प्रकोप करने वाला होता है। 
आड़, विहिर, बढ़ी विहिर, तालाब, ओढ़ा, झरना आदि का जल ये उन उन देशो के गुणधर्मो का माना जाता है।  आनूप , शैल, मरुभूमि आदि इनमे जल का गुणधर्म ही इन आड़, विहिर, सरोवर आदि में आता है। 
अहितकर जल : पिच्छिल, कृमियुक्त, क्लिन्न, सुखी हुई पत्ते-शेवाल-चिखल इनसे युक्त, नीरस-बेचव, सांद्र ( गढूळ ) और दुर्गंधयुक्त पानी का सेवन न करे भगवान वरुण का निवास्थान जो सागर उसमे का पानी ( समुद्रजल ) ये लवणरस और त्रिदोषकारक होता है। 

अथ गोरसवर्ग :

गोरसवर्ग :

गाय का दूध ये मधुर, शीतवीर्य, मृदु, स्निग्ध, बहल ( घट्ट ) , श्लक्ष्ण, पिच्छिल, गुरु, मंद और प्रसन्न इन १० गुणों से युक्त रहता है।  इन गुणों की वजह से समान गुण की ओजादी  वृद्धि होती  है।  ये दूध जीवनीय द्रव्योमे श्रेष्ट होने के कारण रसायन कहके कार्य करता है।  
भैस का दूध ये गाय के दूध से अधिक गुरु और शीत रहता है।  गाय के दूध से अधिक इसमें स्नेहा की मात्रा अधिक रहती है। इसके लिए दूध का प्रयोग निद्रानाश और तिक्ष्णाग्नि होते हुए किया जाता है।  भैस का दूध ये इसप्रकार निद्राकर और मंदाग्निकारक रहता है। 
ऊंटनी का दूध ये रुक्ष, उष्णवीर्य, लघु, लवण रस का ( ईषत लवण ) रहता है।  वातज-कफज रोगो के लिए वैसेही आनाह,कृमि, शोथ और अर्श इनमे ये हितकर रहता है। 
घोड़ी आदि एकखुर रहने वाले प्राणियों के दूध बल्य, स्थैर्यकर, उष्णवीर्य, किंचित अम्ल, रुक्ष तथा शाखागत वातविकारो के लिए हितकर रहता है।  
बकरी का दूध ये कषाय, मधुर रस का, शीतवीर्य, ग्राही, लघु होके रक्तपित्त, अतिसार, क्षय, खास और ज्वरनाशक रहता है। 
मेंढी दूध ये हिक्का और श्वासकर रहता है।  वे उष्ण होके कफपित्तकर होता है। 
हत्तिणि का दूध बल्य, गुरु और उत्कृष्ट स्थैर्यकर रहता है।  
स्त्री  जीवन, बृहण, स्नेहन और सात्म्य रहता है।  वो स्निग्धता उत्पन्न करता है।  रक्तपित्त रोगमे नस्य के लिए और नेत्रशूल में अभितर्पण के लिए उपयुक्त रहता है। 
दही गुण : दही ये रोचन , दीपन, वृष्य, स्नेहन, बलवर्धक, अम्लविपाकी, उष्णवीर्य, वातनाशक, मंगल ( शुभशकुनी ) कारक और बल्य रहता है।  पीनस ( प्रतिश्याय ) अतिसार, विषमज्वर, अरुचि, मूत्रकृछ्र और अतिकार्श्य इनमे दही खाना लाभदायी रहता है। शरद, ग्रीष्म और वसंत इन तीन ऋतु में दही खाना प्रायः वर्ज रहता है ( इसका मतलब अन्य तीन ऋतु में इनका प्रयोग लाभदायी रहता है। ) दही उष्णवीर्य होने के कारन ऊपर के ३ ऋतु में वो न खाये।  रक्त पित्त और कफजविकारो में दही सेवन करना अहितकारक रहता है।  ( संस्कार करके दही नित्य खाना भी हितावह रहता है। ) 
मंदक मतलबअदमूरे दही।  ये त्रिदोषकारक रहता है।  अच्छा लगने वाला, विरज होने वाले  दही ( जात दही ) ये वातनाशक रहता है। दधिसर मतलब दहीके ऊपर की साय ये शुक्रल रहती है तो दधिमंड मतलब दही के ऊपर का पानी ये स्त्रोतोविशोधन करने वाला रहता है। 
तक्र गुण : ताक ये शोथ, अर्श, ग्रहणी, मूत्रकृछ्र , उदररोग, अरुचि, स्नेहपानजनित रोग, पांडु और विषविकारो के लिए उपयुक्त रहती है।  
नवनीत गुण : ताजा निकाला हुआ लोनी ये ग्राही, दीपन, हृद्य होके ग्रहणी और अर्शरोगनाशक रहता है।  वेआर्दित और अरुचि  का भी नाश करते है। 
घृत गुण : तूप ये स्मृति, बुद्धि, अग्नि, शुक्र, ओज, कफ और मेद बढ़ाने वाला है।  वो वात, पित्त, विष, उन्माद, शोष, अलक्ष्मी ( शरीरकी मलिनता ), और ज्वर का नाश करने वाला होता है।  घृत ये सब स्नेहमें उत्तम स्नेह है।  वो शीतवीर्य होके रस और विपाक से मधुर है।  भिन्न भिन्न विधी से संस्कारित घृत ये सहस्त्रपटिसे अधिक गुणकारी रहता है। और इसीलिए हजारो कर्मे करते है।  इसका प्रयोग अनेक प्रकार के विकारो के लिए किया जाता है। 
जिर्णघृतगुण : जीर्ण मतलब पुराना तूप ये मद, अपस्मार, मूर्च्छा, शोष, उन्माद, गरविष, ज्वर, योनिशूल, कर्णशूल, शिरः शूल इनके जैसे सब विकार दूर होते है। 
बकरी , मेंढी , भैंस इनके तूप में उन उन प्राणियों के दूध का गुण रहता है। 
पीयुष मतलब खरवस, मोरट मतलब दूध नष्ट करके उपर मिलने वाला पानी , किलाट मतलब पनीर ये सब जिनका अग्नि प्रदीप्त है और जिनको निद्रानाश जैसे व्याधी है उनको देना सुखप्रद होता है। ये सब पदार्थ गुरूपाकी , तर्पण , वृष्य, बृहण करने वाले होके वातनाशक है। 
तक्रपिंड ( ताक और दूध मिलाकर पकाके तयार होने वाला चोथापाणी एक वस्त्र में बांधके सब पानी जाके जो घट्ट गोला बचता है उसे तक्रपिंड कहते है। ) ये विशद, रुक्ष और ग्राही रहता है। 

अथ इक्षुवर्ग :

इक्षुवर्ग :

दातोसे छीलके, चोखून खाया हुआ गन्नेका रस ये वृष्य , शीत , सर , स्निग्ध,बृहण , मधुर रस और  कफकारक रहता है। 
यंत्रो से निकाला हुआ रस ये विदाह कारक रहता है। 
पौण्ड्रक नामका गन्ना ये शीतवीर्य, निर्मल, मधुर रहता है। 
वंशक नामका गन्ना ये रस और गुण में कम प्रति का रहता है। 
गुड़: गुड़ ज्यादा खाने से कृमी उत्पन्न होती है।  मज्जा, रक्त, मेद, और मांस इनकी वृद्धी गुड़ खाने से होती है। 
जब गन्ने का रस पकाते समय एक चतुर्थांश बचा , दो तृतीयांश बचा या फिर आधा बचा उनको अनुक्रमे क्षुद्र गुड़, धौत गुड़ और स्वल्प मल गुड़ ऐसा कहा जाता है।  इनमे स्वल्पमल गूड,  धौतगुड़ और क्षुद्रगुड़ ये ज्यादासेज्यादा गुरु रहते है। 
गुड़ शर्करा : गुड़ से ज्यादा मत्स्यण्डिका, खण्डशर्करा और शर्करा ये ज्यादासेज्यादा निर्मल रहते है।  उनमे जैसे जैसे निर्मलता आती है वैसे वैसे उनकी शैत्य बढ़ती जाती है। 
गुड़ से बनाई गई शक्कर ये वृष्य , स्निग्ध होके उरक्षत  के लिए हितकर रहती है। 
धमासा से बनाई गयी शक्कर ( शर्करा ) ये कषाय रसात्मक, मधुर और अल्प तिक्त होके , शीतवीर्य रहती  है।  
शहद की शक्कर ये रुक्ष, कफनिष्कासन के लिए उपयुक्त और छर्दि , अतिसार इनमे हितकर रहती है। 
सब प्रकार की शक्कर ये तृष्णा, रक्त पित्त और अंतर्दाह इन रोगोंमें प्रशस्त रहती है। 
मधुप्रकार : माक्षिक, भ्रामर, क्षौद्र और पौत्तिक ऐसे शहद के चार प्रकार है।  इनमे माक्षिक शहद ये श्रेष्ट रहता है।  भ्रामर गुरूपाकी रहता है।  माक्षिक तैलवर्ण के , पौत्तिक घृतसमान वर्णके , क्षौद्र ये कपिल वर्ण के और भ्रामर ये सफ़ेद वर्ण का रहता है।  
मधु के गुण : सब प्रकारके शहद ये वातकारक, गुरु, शीतवीर्य, कषाय और मधुर रस के , रुक्ष, संधानकारक , छेदन करने वाले और रक्तपित्त और कफ विकारो का नाश करने वाले रहते है। 
मधुमक्खी ये स्वतः विषारी रहती है अनेक विषारी फूलो का पराग शहद में मिला हुआ होने की संभावना होती है।  इस प्रकार शहद विषसे संबध होने के कारन शहद गरम न करे। गरम किया हुआ शहद मारक रहता है, उष्णतेसे पीड़ित मनुष्य को दिया हुआ शहद भी मारक रहता है।  शहद गुरु, रुक्ष, कषाय और शीत होने के कारण अल्प मात्रा में लेना ही हितकर रहता है। 
शहद सेवन से अतियोग से होने वाले अजीर्ण से अधिक कष्ठदायक अवस्था और कोई  नहीं होती। कारण इसमें विरुद्धोप क्रम होने के कारन वो विष जैसे ही मनुष्य को जल्दी से मारता है।  आमदोष या आमाजीर्णा में सब प्रकार के उष्ण चिकित्सोपक्रम करने वाले रहते है, परंतु शहद सेवन से होने वाली  आमदोष की उष्ण चिकित्सा विरुद्ध रहती है। इसप्रकार विरुद्धोपक्रम होने से ये आमदोष भयंकर माना जाता है और वो विष जैसे तत्काल मृत्यु दायक रहता है। 
अनेक प्रकार के  फूलो  में मधुमक्खी शहद इकठा करती है।  इसीलिए शहद ये नानाद्रव्यात्मक रहता है और इसीलिए वो योगवाही रहता है। 

अथ कृताघ्न वर्ग :

कृताघ्न वर्ग : 

पेया ये क्षुधा , तृष्नाम ग्लानि, दौर्बल्य, कुक्षीरोग और ज्वर इनका नाश करता है।  वो स्वेदन, अग्निवर्धक होके वात और मल का अनुलोमन करता है। 
विलेपी ये तर्पक, ग्राही, लघु होके हृद्य रहते है। 
मंड ये दीपन, वातानुलोमक होक स्त्रोतस में मृदुता उत्पन्न करने वाली होती है।  लंघन के बाद , विरेचन के बाद, स्नेहपानजनित तृष्णा होने पे मंड का उपयोग करना चाहिए क्युकी मंड ये अग्निवर्धक होके पचन को हल्का रहता है।  मंड का उपयोग करनेसे प्राणरक्षण होता है। 
लाजपेया लाह्या से बनाई पेया ये स्वर क्षीण होने पे भी और श्रम की वजह से आने वाला थकवा दूर करने के लिए हितावह रहता है। 
लाजमंड लाह्या से बनाया हुआ मंड ये तृष्णा और अतिसार इन रोगोका शमन करता है , रसादि धातुका साम्यावस्था प्राप्त करके देता है।  वो कल्याणकारक है।  अग्निदीपक होने पे भी अंतर्दाह और मूर्च्छा निवारण करने वाला होता है। मंदाग्नि या विषमाग्नि पुरुषोंमें वैसे ही बाल, वृद्ध , स्त्री, सुकुमार इनमे विधिवत बनाया हुआ लाजमंड हितकर रहता है।  इसीलिए ऐसी व्यक्तिने इसका सेवन करना चाहिए। 
सिद्ध लाजमंड : शोधन करने के बाद पिंपली सुंठ इनसे युक्त वैसेही दाड़िम इस के साथ तैयार होने वाला लाजमंड ये मलापह मतलब मल का निष्कासन करने वाला रहता है। 
लाह्या ये कषाय - मधुर रस का और लघु रहता है। 
ओदन चावल अच्छे से धोके , पकाके, मंड निकालके तैयार होने वाला भात ये लघु रहता है।  भात ये ताजा और गरमा गरम खाना चाहिए।  चावल भूनने के बाद तैयार होने वाला भात ये संयोगज विष और कफविकारमे लाभदायी रहता है।  
बिना चावल धोये किया हुआ , बिना मंड निकाले  , बिना ठीक से पकाये और थंडगार किया हुआ भट गुरूपाकी रहता है।  
मांस, शाक, वसा, तेल, तूप और फल के साथ बनाया हुआ भात बल्य ,संतर्पण, हृद्य, गुरु और बृंहण करने वाला रहता है।  उडिद , तील , दूध और मुग इनके साथ बनाया हुआ भात इनकेहि गुण का रहता है। 
कल्माष ( उबला हुआ अनाज ) ये गुरु , रुक्ष, वातकर , भिन्नवर्चस्कर रहता है।  जो अनाज पकाके खाया जाता है वो( उदा. सौम्य दाल - मूग , उडिद आदि ) याफिर गेंहू या फिर जव से बनाया जाने वाला पदार्थ इन सब का गुरु लघु आदि गुण ये मूल पदार्थो के गुणकर्मानुसार लगाना चाहिए। 
युषभेद : अकृत यूष , कृत यूष, तनुमांस रस, संस्कारित मांसरस , अम्लसुप , अनम्ल सुप ये सब उत्तरोत्तर ज्यादासेज्यादा गुरु रहते है। सातु ये वातकर , रुक्ष, अधिक पुरीष की उत्पत्ति करता है , वातादि दोष का अनुलोमन करने वाले रहते है इनके सेवन से पुरुष को त्वरेने तृप्ती प्राप्त होती है और वो सद्यः बलकरही रहता है।शाली अनाज से बनाया हुआ सातु ये मधुर रस का, लघु , शीतवीर्य, ग्राही होक रक्तपित्त, तृष्णा, छर्दि और ज्वरनाशक रहती है। 
यवापूप ( जव के पीठ के अनरसे ), जव की पूरी या भुने हुए जव की पूरी ये सब पदार्थ उदावर्त, प्रतिश्याय, कास , प्रमेह तथा गलग्रह इन रोगों का नाश करता है। 
जो भक्ष्य पदार्थ ' धाना ' ( चुरमुरे) इस शब्द से पहचाने जाते है वो सब लेखन कर्म करते है।  ये सब पदार्थ शुष्क होने के कारण तृष्णा निर्माण कराता है।  वो विष्टंभी होने के कारन पचन को थोड़ा समय लगता है। 
कोम्ब आया हुआ अनाज , करंजी, अनरसे, पूरी ये सब पदार्थ चावल की पीठी डालके बनाई जाती है ये सब अत्यंत गुरु गुण के होते है। 
फल, मांस, वसा, शाक,पलल ( तिलकल्क ) और शहद इनसे बनाया जाने वाला खाद्य पदार्थ वृष्य , बल्य होगी  पाचन को बहुत जड़ जाती है। वेशवार ( अस्थिरहित पकाया हुआ मांस-खिमा ) ये गुरु , स्निग्ध, बल और उपचय बढ़ाने वाले होते है। 
दूध और गन्ने के रस से बनाई हुई पूरी ये गुरु, तर्पण, और वृष्य रहती है। 
गुड़, तिल , दूध, शहद और शक्कर मिलाके तैयार किया हुआ खाद्य पदार्थ ये सब  वृष्य, बल्य होगी तो भी पचाने को बहुत जड़ होती है। 
गेंहू के कणक में तूप मिलाके और स्नेहा में ( तेल या तूप में ) तल के जो अनेक पदार्थ बनाये जाता है वे अत्यंत गुरु,तर्पन, वृष्य और हृद्य रहते है। 
गेंहू  और चावल से बनाया जाने वाला खाद्य पदार्थ ये संस्कारो से ( अग्नि संस्कार  या अन्य प्रकार ) लघु बनाता है।  लाह्या, चुरमुरे, पापड़, अपूप ( पूरी या अनरसे ) आदि पदार्थ ये संस्कारानुरूप लघु और गुरु बनते है। जैसा संस्कार घडेगा , तदनुरूप उसमे गुण उत्पन्न होते है। 
पोहा ये गुरु रहता है।  मतलब वो अल्प मात्रा में खाने चाहिए।  जव का पोहा ये गुरु और विष्टंभ कारक  रहता है। 
इस जव का  पोहा में तुस मिलाया होने के कारन उसमे आध्मान और अवष्टंभ उत्पन्न होता है।  अगर यही पोहा तूप के साथ खाया जाय तो द्रवमल प्रवृत्ती होती है। 
सुप्य ( द्विदल अनाज ) द्विदल अनाज से बनाया हुआ पदार्थ ये वातकारक , रुक्ष और शीतवीर्य रहता है। मिरची, तूप, तेल, लवण इन जैसो पदार्थ के साथ इसका अल्प मात्रा में सेवन करना हितावह रहता है। 
जो भक्ष्य पदार्थ मदाग्नि  उपर पकाये जाते है वे सब वैसे ही स्थूल और कठिन पदार्थ ये सब पचाने को बहुत जड़ रहते है। 
भक्ष्य पदार्थ का संयोग और संस्कार देखके उनके अलग अलग लाभदायक मात्रा जानके उनके गुणधर्मो  का अभ्यास करके उनके गुरु लघु गुण ठराया जाता है। 
पके, कच्चे, क्लेद युक्त, विस्तवावर, भुना हुआ ऐसे अनेक प्रकार के भक्ष्य पदार्थ एक में मिलाकर  बनने वाला पदार्थ को विमर्दक ( भेळ ) ऐसा कहा जाता है।  विमर्दक ये पचनेको गुरु, हृद्य, वृष्य और बलवान पुरुषो के लिए हितकर रहता है। 
रसको ( श्रीखंड ) ये बृहण, वृष्य, स्निग्ध, बल्य , रूचिप्रद रहता है। 
गुड़ मिलाके दही खाने से स्नेहन, तर्पण, हृद्य और वातनाशक रहता है। 
अंगूर, खजूर, बोर, फालसा, शहद, गन्ने के पदार्थ ( गुड़, शक्कर आदि ) इसका स्वतन्त्र या एक में ही मिलाकर बनाया गया सरबत ( पानक ) ये गुरु और विष्टंभ रहते है। 
इन सरबत में अगर मिरची जैसी तीखी और लिम्बु जैसी अम्ल द्रव्य मिलाया जाए तो मिलने वाले द्रव्य के मात्रा नुसार शरबत के गुणधर्म निश्चित किये जाते है। 
रागषाडव ये कटु, अम्ल, स्वादु, लवण रसके , लघु, स्वादिष्ट, हृद्य , दीपन होके खाद्य पदार्थो में रूचि उत्पन्न करते है।
आम ( कैरी ), आवला इनका लेह ( चटनी ) ये स्निग्ध, मधुर, गुरु होके वो बृंहण , बलवर्धक, रोचन, तर्पण करने वाली रहती है।  ये चटनी बनाते समय कोण कोनसी द्रव्यों का संयोग और संस्कार किया जाता है और कितनी मात्रा में लिया जाता है, इनके अनुसार गुणकर्म का विचार करना चाहिए।
शुक्त ये रक्त पित्त बढ़ाने वाला , कफवर्धक और वातानुलोमक रहता है। 
आसुत कंद, मूल, फल आदि में थोडेसे शुक्त डालके जो संधानकर्म किया जाता है उसे आसुत कहते है।  इसके गुण शुक्त के जैसे ही रहते है। 
शाण्डाक्ती या फिर तत्सम या फिर शिंण्डाकी दूसरी संधान क्रिया करके बनाया गया पदार्थ ये कुछ समय बाद अम्ल रसात्मक होता है।  वो सब रुचिवर्धक और लघु रहता है। 

अथ आहारोपयोगी वर्ग :

आहारोपयोगी वर्ग :

तेल के सामान्य गुण : सामान्यतः सब प्रकार के तेल ये मधुर रस के, कषायानु रस होने वाले, सुक्ष्म, उष्णवीर्य, व्यवायी, पित्तवर्धक, मलमूत्रोंका विबंध करने वाली , वातनाशक द्रव्यों में श्रेष्ट पर कफवृद्धी न करने वाले , बल्य, त्वचा को हितकर , मेधा और अग्नि बढ़ाने वाला रहता है । अन्य औषधी द्रव्यों के संयोग से और संस्कार से तेल ये सब प्रकार के रोगो का नाश करता है ऐसा माना जाता है।  तेल का दैनदिन उपयोग करके प्राचीन काल में दैत्याधिपति कभी भी वृद्ध नहीं होता।  उनको कोनसा भी नहीं होता।  थकवा भी नहीं आता।  वो युद्धभूमी पर बलवान ठराया जाता है।एरण्डतैल ये मधुर रस का गुरूपाकी , कफवर्धक होके , वातरक्त, गुल्म, हृद्रोग और जीर्णज्वर इन रोगोंमें उपयुक्त रहने वाले द्रव्य श्रेष्ट माना जाता है। 
मोहरी का तेल ये कटु रस का , उष्णवीर्य, रक्तपित्त बढ़ाने वाला , कफनाशक, शुक्रनाशक होके वातव्याधी , कण्डु और कोठ इन रोगोका नाश करता है। 
प्रियाल तेल ( चारोली का तेल ) ये मधुर रसात्मक, गुरूपाकी होके कफवृद्धी करने वाली होती है।  ये अधिक उष्ण नहीं होने के कारण वातज, पित्तज, और द्वंद्वज रोग में भी हितकारी होती है। 
अतसी तेल ( अलशी तेल ) मधुर और अम्ल रसात्मक , कटु विपाकी , उष्णवीर्य होके वातव्याधी में हितकर रहता है।  पर इसके प्रयोग से रक्तपित्त प्रकोप होता है।  
कुसुम्भ तेल ( करडई का तेल ) ये कटु विपाकी , उष्णवीर्य, गुरु, विदाही रहता है।  ये वातादी त्रिदोषका प्रकोप करता है ये इसका विशेष गुण है। 
तैलयोनि गुणधर्म : इसके अतिरिक्त अन्य जो तेलबिज से तेल निकाल के उनका आहार में उपयोग किया जाता है उस तेल में उन उन फल जैसे गुणकर्म रहते है। 
वसा और मज्जा ये दोनों द्रव्य मधुर रस की , बृंहण , वृष्य और बलवर्धक रहती है।  जीन प्राणियों की वसा और मज्जा ली जाती है तदनुसार शैत्य और उष्णता निश्चित करनी चाहिए। 
सुंठ ये स्नेहन, दीपन, वृष्य, उष्णवीर्य, कटु रसात्मक पर मधुर, विपाकी , हृद्य , रुचिकर होके वातकफघ्न होती है। 
गीली पिंपली ये कफकारक, मधुर रसकी , गुरु और स्निग्ध रहती है।  
सुखी पिंपली ये कफवातनाशक, कटुरस की , उष्णवीर्य और वृष्य रहती है। 
काले मिरे ( मरिच ) ये अतिउष्ण नहीं रहते वैसे ही ज्यादा वृष्य भी नहीं रहते। ये लघु, रुचिकर, छेदन और शोषण गुणों से युक्त होने के कारण दीपन और कफवातनाशक रहती है।  
हिंग ये वातकफघ्न, विबंध दूर करने वाला, कटु, उष्णवीर्य, लघु, दीपन, पाचन, रुचिवर्धक होके , शूल प्रशमन करने वाला रहता है।  
सैंधव ये रोचन, दीपन, वृष्य, चक्षुष्य, अविद्राही, त्रिदोषनाशक, लवण और मधुर रसात्मक होके सब लवण में श्रेष्ट माना जाता है।  सौंचर नमक ( संचल नमक , पादेलोण ) ये सूक्ष्म, उष्ण, लघु और सुगंधित होने के कारण रुचिकर होता है।  ये विबंध दूर करने वाले हृद्य और उदगार शुद्धिकर रहता है।  इसको ही काला नमक कहते है। 
बिडलवण तीक्ष्ण उष्ण, व्यवायी होने के कारण, दीपन, शूलनाशक और उर्ध्व तथा अधोभागमें का वायु अनुलोमन करता है। उदभिज लवण ये तिक्त , कटु रसका , क्षारयुक्त, तीक्ष्ण और शरीर में का क्लेद उत्पन्न करने वाला होता है।  
काल लवण ये पादेलोण जैसेही गुणधर्मो के पर इसको विशिष्ट अंग मात्र नहीं रहते। 
सामुद्र लवण ये लवण , अल्प मधुर, अल्प तिक्त रस का रहता है।  
पांशुज लवण ये कटु रसका रहता है। 
प्रायः सब प्रकारकी लवण ये रुचिकारक, अन्नाका पाक करने वाली , क्लेद निर्माण करने वाली , मलनिस्सारक और वातनाशक रहती है। 
यवक्षार ( जवखार ) ये हृद्रोग, पाण्डु, ग्रहणी, प्लीहदोष आनाह, गलग्रह, कास  और कफज अर्श इन सब का नाश करता है। 
क्षार गुणधर्म :प्रायः सब प्रकार के क्षार ये तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, रुक्ष, क्लेदि, पाचक, व्रण विदारक, दाहकर, दीपन, कफके च्छेदन करने वाले और अग्निसमान गुणयुक्त  रहता है। 
कारवी ( शहाजीरे ), कुञ्चिका ( मेथी ) , अजाजी ( जीरे ) , यवानी (ओवा),तुम्बुक ( धने) ये रुचिकारक, दीपन, वातकफघ्न और शरीरदुर्गंध नष्ट करने वाले होते है। 
आहार में उपयोगी द्रव्योकी वर्गवारी ये निश्चित नहीं है।
इत्याहारायोगीवर्गों द्वादशः 
प्रायः सब प्रकारकी शूकधान्य और शिबिधान्य ये समाती में मतलब एक साल से पुरानी ऐसी श्रेष्ट मानी जाती है। पुराना अनाज ये प्रायः रुक्ष तो नया धान्य प्रायः गुरु ( पचने को जड़ ) रहता है। 
जो अनाज जितने जल्दी उगता है और पिक देता है , उतना वो ज्यादा लघु माना जाता है।  छिलका निकालके युक्तिपूर्वक भुना के बनाई गयी दाल , उसल ये जल्दी से पचता है।  
निषिद्ध मांस : मृत - किसने तो मारा हुआ नहीं पर मरा हुआ , कृश ( केवल अस्थिपंजर ) , अति मेदस्वी, अतिवृद्ध या अतिबाल , विष प्रयोग से मृत , आनूप देशो के , सर्पबांधा से मृत ऐसे पशु का मांस वर्ज्य माना जाता है। 
इसके अतिरिक्त अन्य प्रकारके मांस ये बल्य और बृंहण रहता है। 
अग्राह्य शाक : कीड़ा हुआ , वारा और धुप की वजह से झड़े हुए, मुरझाये हुए , सूखे हुए , बहुत जून , बेमौसमी मतलब अकाली होने वाले , बिना तूप या तेल की फोडणी दिए वैसे वाफ़ देके उसका पानी बिना निचोड़े तैयार किया जाने वाली पाले भाजी न खाये। 
असेवनीय फल : बहुत पका हुआ , कच्चा, कीड़ा हुआ, सर्प या फिर हिंसक पशु पक्षी-ठंडी , धुप इनसे दूषित , अकाली और अलग देश में तैयार होने वाले और सड़ा हुआ फल ये निषिद्ध माना जाता है। 
चटनी कोशंबीर के आले , प्यास, कोथिंबीर आदि पदार्थ पहले बताये गए है , उनके ग्राह्यग्राह्य का  विचार पालेभाजी जैसा ही करना चाहिए।  परन्तु पालेभाजी जैसा उकड़ के, निचोड़ के,या तेल तूप में पकाके लेने की इन द्रव्यों की अपेक्षा नहीं है। 
मद्य, जल, गोरस आदि ग्राह्यग्राह्य ते का विचार उन उन वर्ग के वर्णन के समय किया है। 
अनुपान : जो पेय पदार्थ आहार द्रव्योके विपरीत गुण का रहता है वो पदार्थ उस अन्न के लिए अनुपान कहके उपयोग उचित रहता है मात्र ये अनुपान के लिए उपयोग होने वाले द्रव्य धातुके विरोधी नहीं रहने चाहिए। आसव के ८४ भेद पूर्वी बताये गए है। पेय जल या अपेय जल इनका वर्णन किया है।  इन सब की यथायोग्य परीक्षा करके जो हितकर होगा उसका पान के लिए उपयोग करना हितावह रहता है। 
वातज विकार में स्निग्ध और उष्ण, पित्तज विकार में मधुर और शीत , कफज विकारमे रुक्ष और उष्ण तो क्षय में मांसरस श्रेष्ट रहता है। उपवास, पैदल प्रवास, ज्यादा बड़े आवाज में बोलना, अधिक मैथुन, क्लान्त और उष्माभिघात होने में दूध  ये अमृत जैसे रहता  है। 
कृश व्यक्ति में पुष्टि प्राप्त होने के लिए मद्य का अनुपान उपयोग करते है। स्थूल व्यक्तिमें कृशता लाने के लिए शहद सरबत अनुपान के लिए उपयोग करना चाहिए। 
मंदाग्नि, निद्राल्पता,तंद्रा, शोक, भय, स्तुस्ति इनसे पीड़ित व्यक्ति में वैसे ही जिनको मद्य और मांस सेवन का सल्ला दिया है, एसेसब के लिए शहद का अनुपान श्रेष्ट माना जाता है। 
अब अनुपान वर्ग के गुण देखते है।  अनुपान तृत्प करता है,चित्त प्रसन्न करता है , शरीर का बल आधान करता है, मासतत्व बढ़ाता है , पर्याप्ति ( शरीरक्षा ) करता है , खाया हुआ अन्न को अनुलोम गति प्राप्त करके देता है , स्थूल अन्न को घुसल के तरल बनाता है , मृदुता उत्पन्न करता है , भोजन द्रव्य को द्रवता प्राप्त करके देता है और अन्नपचन को मदत करता है।  अन्न पाचन करके वो शरीर में सर्वत्र संचार करने के काबिल बनाता है। 
हितकर अनुपान के प्रयोगसे शीघ्रतृप्तता मिलती है।  दीर्घायु और बलप्रदान करने के लिए आहार का सुख पूर्वक पाचन करता है। 
जिन  व्यक्तिको ऊर्ध्वजत्रुगत भाग को वातप्रकोपजन्य कोनसाभी रोग होगा तो हिक्का, श्वास, कास  ये रोग होंगे , जिनको गाना , भाषण और जोरोसे पठन करने को चाहिए , जिनको उरः क्षत होगा उन्होने खाने के बाद पानी नहीं पीना चाहिए।  अगर उन्होंने भोजन के बाद जल प्राशन किया तो वो जल आहारद्वारा गल और उरः प्रदेश में प्राप्त होने वाला स्नेहांश नष्ट करता है और उपर वर्णन किये हुए रोगो की वृद्धि करता है। 
प्रायः हर रोज आहार में आनेवाले अन्न और पानका यहाँ वर्णन किया गया है।  कारण प्रत्येक द्रव्यों का नाम लेके उनका निर्देश करना ये संभवनीय नहीं है।  
जिसप्रकार संसार के सर्व द्रव्य में औषध रहते ,उसी प्रकार उन उन प्रदेश  के व्यक्तियों के कथना के अनुसार वहाँकी द्रव्यों का गुणक्रम का विवेचन किया गया है , जिसका उल्लेख नहीं है उन द्रव्यों  के बारे में ये चीज ध्यान में रखने चाहिए । 
अन्नपान परीक्षा : जिन द्रव्यों के गुण का वर्णन नहीं है उनके गुणदोष जानने के लिए तो द्रव्य का या फिर उस प्राणी के रहने का , घूमने का देश , उसका खानपान , स्वभाव, धातु, क्रिया, लिंग, शरीर के अवयव के जैसे,संस्कार और मात्रा इनकी परीक्षा करनी चिहिए। 

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