We are Requesting Donations To Serve Humanity, Your 1 Penny Is Heplful To Us 

रक्त प्रदर - Menorrhagia in Ayurveda

रक्त प्रदर ( असृग्दर )

व्याख्या : असृग्दर - खून ( अवयव ) फट के बहार गिरने से अधिक मात्रा में स्रवते इसीलिए असृग्दर या फिर अधिक मात्रा में बहते है इसीलिए प्रदर ये नाम इस व्याधीको प्राप्त हुआ है। सुश्रुताने इस व्याख्या का वर्णन करते समय कहा है | जिस समय रजप्रवृत्ती  पाली के समय या फिर मासिक पाली नहीं होने के समय अधिक मात्रा में स्रवते उस समय इस व्याधी को असृग्दर ऐसे कहा जाता है |
रक्त प्रदर - Menorrhagia in Ayurveda मात्र उस समय स्रवण करते हुए रज का स्वरुप कुछ अलग रहता  है | निर्दोष और प्रकृत रज की जो लक्षण बताई हुई है वो उन स्राव के जगह पे नहीं रहते इसीलिए आगे बताये हुए वातादी

दुष्टिलक्षनोसे युक्त एसे बहोत से रजः प्रवृत्ती होंगे उस समय प्रदर ये संज्ञा दीजिये | अन्यथा दोषदुष्टी के लक्षण  जब बिलकुल भी नहीं या फिर बहुत कम रहने पर रजः प्रवृत्ती की मात्रा उतनी ही ज्यादा रहती तो उसे रजोवृद्धी ( अत्यार्तव ) ये व्याधी दी जाए | रजोवृद्धी या प्रदर इनमे दोषदृष्टि लक्षण कम या ज्यादा इनके मदत से व्यवच्छेद करना चाहिए |
संग्रह के सूत्रों के हिसाब से रज के अतिप्रवृत्ति लक्षण को असृग्दर , प्रदर इतना ही नहीं तो योनिव्यापत रक्तयोनी ऐसे भी संज्ञा दी गयी हो तो भी चिकिस्त के जो सूत्र बताये गए हे उनमे अतिप्रवृत्ती ये एक लक्षण अवस्था विशेषोने भिन्न भिन्न स्वरुप के रहते है और उसकी वजह से उनकी चिकिस्ताभी अलग अलग स्वरुप की - कभी रक्त-पित्त जैसी , तो कभी योनिरोग जैसी करनी चाहिए ऐसे बताते है।

 रक्तप्रदरके निदान :

जो स्त्री नमकीन , खट्टा ,  अपचनीय आहार  तीखा आहार खाए, कसैला ऐसे पदार्थ खाते है चिड़चिड़ा पण उत्पन्न | सुवर जैसे ग्राम्य और जलचर प्राणी के मेदोबहुल ऐसे मांस खाते है , खीर, खिचड़ी , दही, शुक्त, दही का पानी , मद्य पदार्थ अधिक मात्रा में खाते है उस स्त्री को प्रदर उत्पन्न होता है |

रक्तप्रदर की संप्राप्ति :

इसी तरह अन्न पानी से रक्त और उसका उपधातु रज इनकी दुष्टि होते ; उसकी मात्रा बढती है | स्त्रोतोरोध उत्पन्न होता है और उसकी वजह से वातवृद्धि होती है |
 वायु गर्भाशय के साथ मे रजोवह स्त्रोतस के आश्रय द्वारा रजके संचिति के प्रमान ज्यादा बढाके उसे ( रज को ) योनि के मार्ग मे से ज्यादा मात्रा मे बहार निकालता है |इसके वातज, पित्तज, कफ़ज और सन्निपातिक ऐसे चार रूप है | 


वातज रक्त प्रदर :
रुक्षादि कारनो से प्रकुपित किया हुआ वायु सामान्य संप्राप्ति मे बताये गये तरिके से रज कि अतिप्रवृत्ती कि जाती है | इस वातज प्रदर मे घडने वाले स्राव का स्वरुप झागदार, तरल, सूखा, कालापन, पलास के फूल के काढ़े जैसे रहता है। इस समय ये स्राव चालु रहते समय योनि के रास्ते में वेदना होती है या फिर नहीं भी रहती है | कटी, वक्षण, उर, पार्श्व, पृष्ट, श्रोणी ( नितंब ) इत्यादी अवयव में परंतु वातज प्रदर में तीव्र स्वरुप की वेदना होती है | 

पित्तज रक्त प्रदर :

अम्ल, उष्ण, लवण, क्षार इत्यादि कारणो से प्रकुपित पित्त सामान्य संप्राप्ति जैसे रजः प्रवृत्ति बढ़ाते है | इस पित्तज प्रदर में स्राव का स्वरुप  नीला, पीला,काला और उष्ण स्पर्श युक्त रहता है | बहुत से समय स्राव ये रक्त स्वरुप में भी रहता है और स्राव होते समय ऊपर के ऊपर दर्द होता रहता है | योनि को जलन होती है | इसके अलावा जलन, राग, तृषा, मोह,ज्वर,भ्रम ऐसी पित्त की वजह से भिन्न भिन्न सार्वदेहिक लक्षण रहते है | 


कफज रक्तप्रदर :

भारी, मधुर इत्यादि कफवर्धक कारणो से कफ प्रकुपित होता है | ये पूर्वी के जैसे प्रदरकी संप्राप्ती बनाने के कारण होता है | इस कफज प्रदर में स्राव के स्वरुप बुलबुलित , फिकट वर्ण के , जड़ , स्निग्ध , स्पर्श शीत और मंद , वेदनायुक्त ऐसे असते। बुलबुलित और स्निग्ध, या लक्षण की वजह से रजः स्राव मे कफ मिलने जैसा दिखता है और छर्दी, अरुची , हल्लास ( मलमल ) , श्वास, कास ऐसे कफ की सार्वदेहिक लक्षण दिखते है | 


सन्निपातिक रक्तप्रदर  :

सन्निपातिक प्रदर में स्तन्यदृष्टी की जो कारणे चरकने बताई गई वही रहती है | वो कारणे - 
अजीर्ण होने, असात्म्य, विषम विरुद्ध ऐसे अन्न के अति मात्रा में सेवन करता ; नमकीन, खट्टा, तीखा, क्षारयुक्त और बासी होक लाल या फिर तार आये हुए ( प्रक्लिन्न ) पदार्थो का सेवन करना ; मन और शरीर इनका गुस्सा होना , रात्री को नींद न आना , चिंता होना , उत्पन्न वेग धारण होना और अनुत्पन्न वेग कुंथून उत्पन्न करता | गुड़ के पक्वान खाने , खिचड़ी , अदमोरे दही , अभिष्यंदी पदार्थ, ग्राम्य ,आनूप और जलचर प्राणी के मांस खाना और इस स्वरुप का आहार के साथ दिन में सोना , बहुत सा मद्य पीना। शरीर को कोनसे भी स्वरुप का व्यायाम मिला नहीं कही पे चोट लगी, क्रोध अनावर होना और इतर कोनसे व्याधी से शरीर क्षीण होना तो तीन भी दोष का प्रकोप होके सन्निपातिक प्रदर उत्पन्न होता है।  

इन त्रिदोष के प्रदरमे तीन दोष के लक्षण दिखाई देता है और दोषो से उत्पन्न हुए विविध अवस्थाही रहते है। स्त्री अधिक पीड़ित होक रक्त रजके अतिप्रवृत्ती से अत्यंत क्षीण होते है और त्रिदोषक मिथ्या आहार विहार अगर इसी स्थितिमे चालू रहे तो वातप्रकोप ज्यादा होता है।  और उसकी वजह से कफ भी रज के बराबर योनि के मार्ग से बहार निकल ना शुरू हो जाता है।  स्राव को बदबू , बुलबुलित पण रहता है। पित्त के अनुबंध से स्राव पीतवर्णी या विदग्ध होता है।  आगे आगे तो मेद और वसा इनको भी वायु अपत्यमार्ग से जल्दी से बहाता है , और फिर स्रावा में भी तूप,मज्जा, वसा इनके जैसे स्वरुप मिलते है।  ये स्राव जैसा चालू रहता है। उसका परिणाम स्त्री अत्यंत दुर्बल और क्षीणरक्त  होती है।  जलन, तृषा, ज्वर ऐसा त्रास दायक लक्षण उत्पन्न होता है।  ये सन्निपात की अवस्था असाध्य ऐसी है। 

Post a Comment

0 Comments