We are Requesting Donations To Serve Humanity, Your 1 Penny Is Heplful To Us 

धातुओं की क्षय - वृद्धि के कारण एवं लक्षण sapt dhatu

धातुओं की क्षय - वृद्धि के कारन एवं लक्षण 

दोषो के समान ही धातुओं की समता शरीर के स्वास्थ्य के लिए तथा क्षय-वृद्धि रोगो के लिए तथा क्षय-वृद्धि रोगो के लिए उत्तरदायी होती है।  चुँकि धातुओं की मात्रा अधिक होने के अल्प मात्रा में उत्पन्न क्षय - वृद्धि रोगकारक नहीं होती है, परन्तु अधिक मात्रा में और अल्प प्रमाण में ही सही, अधिक काल तक बनी रहने वाली क्षय - वृद्धि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रोगकारक होती है।  शरीर का धारण करना ( धारणात धातवः ) धातुओं का प्रधान कर्म है। रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सात धातुओं के निर्माण में आहार, पाचकाग्नि के साथ-साथ धात्वग्नि की, विहार की स्थिति का भी महत्व है। धातुओं की क्षय - वृद्धि के कारण  एवं लक्षण sapt  dhatu



सामान्य-विशेष के सिद्धान्त के आधार पर आहार-विहार के परिणाम स्वरुप धातुओं की वृद्धि या क्षय होता रहता है।  द्रव्य-सामान्य, गुण - सामान्य , कर्म-सामान्य आहार पदार्थ ' सामान्यं वृद्धिकारणम ' सिद्धान्त के अनुसार अपने समान गुणधर्मो धातु के लिए वृद्धिकारक होते है।  ठीक इसी प्रकार द्रव्य - विशेष , गुण - विशेष , कर्म - विशेष आहार पदार्थ ' ह्रासाहेतुः विशेषश्च ' सिद्धान्त के अनुसार धातुओं के क्षय के लिए उत्तरदायी होते है।  सात्म्य व्यायाम धातुओं की वृद्धि के लिए और असात्म्य अथवा अमात्रा में किया हुआ व्यायाम धातुओं के क्षय के लिए उत्तरदायी होते है।  
अधिक व्यायाम , अनशन , चिन्ता, अति  रुक्ष, अल्प भोजन, तीव्र वायु और धुप का सेवन, भय, शोक, रुक्ष मद्यपान, जागरण, कफ, रक्त,शुक्र और मलो की अति मात्रा में  प्रवृत्ति, काल ( वृद्धावस्था ), भूत-प्रेतादि की बाधाएं सभी प्रकार के क्षय के सामान्य हेतु है।  

धातुवृद्धि के कारण 

शरीर के लिए परम उपयोगी होते हुए भी किसी धातु का अप्राकृत रूप से बढ़ना विकृतिजन्य ही होता है।  सप्त धातुओं में से किसी एक धातु का पोषण विशेष होने के कारण उसके आश्रय एवं कर्म स्थान में उस धातु की वृद्धि होने लगती है।  अधिक पोषण के साथ साथ यह वृद्धि उस उस धातु के स्त्रोतोरोध का कारण भी होती है और वृद्धि के कारण स्त्रोतों में विशिष्ट अवरोध होता है।  पुनः अवरोध के कारण उस एक धातु का पोषण अधिक होने से उस धातु की वृद्धि हो जाती है और उत्तरोत्तर धातु का पोषण ठीक से नहीं हो पाने के कारण उत्तरोत्तर धातुओं का क्षय हो जाता है।  इस प्रकार एक धातु की क्षय - वृद्धि दूसरी पूर्ववर्ती या परवर्ती धातु को प्रभावित करती है।  दोष एवं धातुओं का आश्रय-आश्रयी सम्बन्ध सर्वविदित है।  आश्रय की क्षय - वृद्धि आश्रयी की क्षय -वृद्धिकारक होती है।  इसमें वायु और अस्थि अपवाद है.
धातुओं की साम्यावस्था , क्षयावस्था तथा वृद्धावस्था के लक्षण जानना एक चिकिस्तक  के लिए अत्यन्त आवश्यक है।  

धातुओं के प्राकृत, क्षय एवं वृद्धि के लक्षण 

रसधातु

रसधातु के प्राकृतिक कर्म एवं लक्षण में  तर्पण , धारण , जीवन यापन करना आदि होता है।  
रसधातु के क्षय लक्षण में  हृत्पीड़ा , कम्प , शून्यता,तृष्णा, रुक्षता , श्रम, शोष, ग्लानि, शब्दासहिष्णुता, रसधातु के प्राकृत कर्मो का ह्रास आदि होता है।  
रस धातु के वृद्धि लक्षण में  हृल्लास , छाया , प्रसेक, छर्दि , गौरव, अग्निमान्द्य , आलस्य , श्वास , कास , शैथिल्य, अतिनिद्रा, श्वेतता , शैत्यता आदि होता है।  

रक्त धातु

रक्त धातु के प्राकृत कर्म एवं लक्षण में  कर्णपूरण, वर्णप्रसादन, मांसपुष्टि, जीवन लक्षण बल , प्रसन्न वर्ण , प्रसन्न इन्द्रिय , समाग्नि , पुष्ट शरीर , विषयो में रूचि कराना आदि होता है ।  
रक्त धातु के क्षय लक्षण में  अग्निमान्द्य , वातप्रकोप , सिराशैथिल्य, त्वग्रूक्षता, अम्ल और शीत पदार्थो के प्रति प्रीति आदि होता है ।  
रक्त धातु के वृद्धि लक्षण  में त्वचा और तेज में रक्तता , सिरापूर्णता आदि होता है।  

मांसधातु

मांसधातु के प्राकृत कर्म और एवं लक्षण में  शरीर पुष्टि तथा मेद की पुष्टि आदि होता है।  
मांसधातु के क्षय लक्षण में  नितम्ब , गला, ओष्ट , शिश्न छाती , ग्रीवा, कक्षा ,पिण्डली में क्षीणता, शरीर में रुक्षता , तोद , अंगसाद , श्रम , शैथिल्य आदि होता है।  
मांस धातु के वृद्धि लक्षण  में नितम्ब , गाल, ओष्ट, शिश्न, बाहु, पिण्डली - इनकी स्थूलता, गुरुगात्रता आदि होता है ।  

मेद धातु

मेद धातु के प्राकृत कर्म एवं लक्षण  में अस्थिपुष्ट, शरीर का स्नेहन , मार्दव, दृढ़ता सम्पादन करना होता है।  
मेद धातु  के क्षय - लक्षण  में सन्धिस्फुटन व शून्यता ,शरीर आयास , निष्प्रभ नेत्र , तनु - उदर, प्लीहा भिवृद्धि आदि होता है।  
मेद धातु  के वृद्धि लक्षण  में अगस्निग्धता, उदरपार्श्व की वृद्धि , कास - श्वास , शरीर दौर्गन्ध्य आदि होता है ।  

अस्थि धातु

अस्थि धातु के प्राकृत कर्म एवं लक्षण में देहधारण, मज्जा की पुष्टि होती है।  
अस्थि धातु के क्षय - लक्षण में अस्थितोद, दन्त, नख, भंगुरता, शरीर की रुक्षता, केश, रोम, श्मश्रु का झड़ना, श्रम, सन्धि शैथिल्य आदि होता है।  
अस्थि धातु के वृद्धि लक्षण में अधि - अस्थि , अधि - दन्त , केश , नख की अतिवृद्धि अदि होता है।  

मज्जा धातु

मज्जा धातु के प्राकृत कर्म एवं लक्षण में शरीर का स्नेहन, बल सम्प्रादन , धातु की पुष्टि होती है। 
मज्जा धातु के क्षय लक्षण में धातु की न्यूनता, अस्थि - शून्यता , तोड़, पर्वभेद , अस्थियो का दुर्बल व् लघु होना आदि होता है। 
मज्जा धातु के वृद्धि लक्षण में सर्वांग में विशेषतः नेत्र में गौरव , तमोदर्शन, मूर्च्छा , भ्रम, अस्थिपर्व में विशाल व्रण होना , पर्वभेद आदि होता है ।  

शुक्र धातु 

शुक्र धातु के प्राकृत कर्म एवं लक्षण में च्यवन, प्रीति, स्थैर्य , देहबल , हर्ष , गर्भोत्पत्ति के लिए बीज प्रदान करना आदि होता है  ।  
शुक्र धातु के क्षय लक्षण में दौर्बल्य, मुखशोष,पांडुत्व , सदन , श्रम,शुक्र की अच्युति या विलम्ब से च्युति या रक्तमिश्रित च्युति,मेढु तथा वृषण में वेदना आदि होता है ।  
शुक्र धातु के के वृद्धि लक्षण में शुक्राश्मरी, शुक्र की अति प्रवृत्ति आदि होता है । 

रज धातु 

रज धातु ( आर्तव ) के प्राकृत कर्म एवं लक्षण में रक्त के लक्षण के समान लक्षण , गर्भत्पत्ति करना आदि होता है ।  
रज धातु ( आर्तव ) के नियतकाल में अदर्शन या अल्पदर्शन , योनि वेदना आदि होता है ।  
रज धातु ( आर्तव ) के वृद्धि लक्षण में अंगमर्द, अतिप्रवृत्ति, दुर्गंध आदि होता है । 

Post a Comment

0 Comments